जब से पंकज चौधरी भारतीय जनता पार्टी के नए प्रदेश अध्यक्ष बने हैं, तब से उत्तर प्रदेश की राजनीति में लगातार उथल-पुथल मची हुई है। संगठनात्मक अनुशासन के नाम पर लिए जा रहे फैसले अब सियासी असंतोष का रूप लेते जा रहे हैं। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि पंकज चौधरी का रवैया बार-बार ब्राह्मण समाज को लेकर टकराव की स्थिति पैदा करता दिख रहा है। पहले ब्राह्मण समाज के सामूहिक भोज पर रोक, फिर बैठकों और संवाद पर अंकुश और अब ब्राह्मण समाज के नायक माने जाने वाले वरिष्ठ नेता हरीश द्विवेदी के सार्वजनिक सम्मान को टुकड़ों में बांटना—ये तमाम घटनाएं मिलकर यूपी की राजनीति को ऐसे माहौल में ले जा रही हैं, जहां भाजपा को फायदा नहीं, सिर्फ नुकसान दिखाई दे रहा है। मौका था पंकज चौधरी के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद पहले गोरखपुर आगमन का। जोर-शोर से रोड शो निकाला गया।
इसी दौरान बस्ती से दो बार सांसद रह चुके, संगठन में लंबा अनुभव रखने वाले और ब्राह्मण समाज के बड़े चेहरे माने जाने वाले हरीश द्विवेदी हज़ारों कार्यकर्ताओं के साथ स्वागत में खड़े थे। बाकायदा टेंट लगा, मंच सजा और कार्यकर्ताओं को मंच से यह तक समझाया गया कि स्वागत कैसे किया जाना है। लेकिन जैसे ही पंकज चौधरी का काफिला पहुंचा, तस्वीर पूरी तरह बदल गई। न तो माला पहनी गई, न गाड़ी एक मिनट के लिए रुकी और सबसे हैरान करने वाली बात—काफिला आगे बढ़ते वक्त बाउंसर द्वारा हरीश द्विवेदी को धक्का दिए जाने का दृश्य सामने आया। यह पूरा घटनाक्रम कैमरे में कैद हुआ और वीडियो वायरल होते ही राजनीति गरमा गई।
राजनीति में हर दृश्य एक संदेश देता है। यह संदेश सिर्फ हरीश द्विवेदी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ब्राह्मण समाज ने इसे अपने सम्मान से जोड़कर देखा। सवाल उठने लगे कि जब इतना बड़ा नेता सड़क पर खड़े होकर अपमानित हो सकता है, तो सामान्य कार्यकर्ता की हैसियत क्या रह जाती है? विडंबना यह रही कि इस पूरे घटनाक्रम के बाद भी हरीश द्विवेदी मंच पर पहुंचे और पहला नारा लगाया—“पंकज चौधरी जिंदाबाद।” यह नारा निष्ठा का था या मजबूरी का, इस पर बहस जारी है, लेकिन इसने संगठन की अंदरूनी सच्चाई जरूर उजागर कर दी। शायद पंकज चौधरी यह भूल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति सिर्फ पद और संगठन से नहीं चलती, बल्कि समाजों के संतुलन से चलती है। प्रदेश में 100 से ज्यादा ऐसी विधानसभा सीटें हैं जहां ब्राह्मणों का सीधा और निर्णायक प्रभाव माना जाता है। ऐसे में लगातार ऐसे संकेत देना कि ब्राह्मण समाज को नजरअंदाज किया जा रहा है,
राजनीतिक तौर पर जोखिम भरा कदम है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बार-बार इस संतुलन की बात करते रहे हैं। योगी जानते हैं कि चाहे नेतृत्व क्षत्रिय हो या किसी और समाज का, ब्राह्मणों को साथ लिए बिना यूपी की सत्ता स्थिर नहीं रह सकती। यही डर योगी कई मंचों पर जाहिर भी कर चुके हैं। ब्राह्मण विधायकों की “क्लास”, सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजनों पर रोक और अब वरिष्ठ नेता के साथ हुआ व्यवहार—इन सबने मिलकर यह धारणा बना दी है कि संगठन का शीर्ष नेतृत्व इस समाज को साथ लेने के बजाय संदेश देने में लगा है। राजनीति में जब संदेश गलत जाता है, तो उसका असर खामोशी में दिखता है और चुनाव के वक्त अचानक सामने आता है।
आज ब्राह्मण समाज भले ही खुलकर सड़क पर न हो, लेकिन भीतर की नाराज़गी साफ महसूस की जा सकती है। यही वह स्थिति है जिसे राजनीति में सबसे खतरनाक माना जाता है—खामोशी, लेकिन असंतोष। अब इस पूरी खबर का निष्कर्ष क्या है तो वो भी आप जान लीजिये ,,,पंकज चौधरी के पास प्रदेश अध्यक्ष का पद है, लेकिन उसके साथ बड़ी जिम्मेदारी भी जुड़ी है। हर फैसला, हर व्यवहार और हर अनदेखी दूर तक असर करती है। अगर यही सिलसिला जारी रहा, तो यह साफ है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में इसका खामियाजा सिर्फ किसी एक नेता को नहीं, बल्कि पूरी भाजपा को भुगतना पड़ सकता है।


