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आरक्षण विरोधी शेर बनकर उभरे अनिल मिश्रा, कोर्ट ने लगायी मोहन यादव के पुलिस को फटकार

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सवर्ण समाज में अगर आज किसी एक नाम की सबसे तेज़ गूंज सुनाई दे रही है, तो वह है ग्वालियर के सीनियर एडवोकेट अनिल मिश्रा। अंबेडकर पोस्टर विवाद के बाद गिरफ्तारी, सरकार की सख्ती और फिर हाईकोर्ट से राहत—इस पूरे घटनाक्रम ने अनिल मिश्रा को सवर्ण समाज के बीच “आरक्षण विरोधी शेर” की पहचान दिला दी है। पैसे से वकील अनिल मिश्रा इन दिनों अंबेडकर से जुड़े एक विवादित पोस्टर मामले को लेकर सुर्खियों में हैं।

इसी मामले में उनके खिलाफ पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया था। माना जा रहा था कि मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार और पुलिस यह समझ बैठी थी कि गिरफ्तारी के साथ ही मामला शांत हो जाएगा, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट निकली। अनिल मिश्रा को जेल की चारदीवारी भी रोक नहीं पाई और महज तीन दिन के भीतर वे सलाखों के पीछे से बाहर आ गए। सवर्ण समाज और हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकीलों का आरोप है कि भीम आर्मी और दलित संगठनों के दबाव में आकर मोहन यादव सरकार ने कार्रवाई करवाई। हालांकि, हाईकोर्ट की स्पेशल डबल बेंच ने इस पूरे मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते हुए अनिल मिश्रा को लंबे समय तक हिरासत में रखना अवैध करार दिया और उन्हें जमानत दे दी। कोर्ट ने भले ही एक लाख रुपये के बॉन्ड पर जमानत दी हो, लेकिन सोशल मीडिया पर समर्थक खुलकर लिख रहे हैं—“एक लाख नहीं, करोड़ों रुपये अनिल मिश्रा के लिए कुर्बान हैं।

”यही नहीं, सवर्ण समाज ने उन्हें “आरक्षण विरोधी शेर” बताते हुए उनकी गिरफ्तारी को सीधे-सीधे विचारधारा पर हमला करार दिया है। जमानत मिलने के बाद बुधवार रात करीब 8 बजे अनिल मिश्रा को ग्वालियर की केंद्रीय जेल से रिहा किया गया। कोर्ट का आदेश शाम को ही आ गया था, लेकिन रिहाई का ऑर्डर देर से जेल पहुंचा। जैसे ही यह खबर फैली, सैकड़ों की संख्या में वकील, समाजसेवी और समर्थक केंद्रीय जेल के बाहर जमा होने लगे।मीडिया ने उनसे बात करने की कोशिश की, लेकिन भारी भीड़ के कारण कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी। बावजूद इसके, उनके समर्थकों का उत्साह यह साफ दर्शा रहा था कि अनिल मिश्रा की रिहाई को वे सिर्फ जमानत नहीं, बल्कि विचारधारा की जीत मान रहे हैं।फिलहाल अनिल मिश्रा जेल से बाहर हैं, लेकिन सवर्ण बनाम आरक्षण और सत्ता बनाम समाज की यह लड़ाई यहीं थमने वाली नहीं दिख रही। अनिल मिश्रा अब सिर्फ एक वकील नहीं, बल्कि आरक्षण विरोध की आवाज़ और सवर्ण समाज के प्रतीक चेहरे के तौर पर उभरते नजर आ रहे हैं।

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