उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जिनका कद चुनावी आंकड़ों से कहीं बड़ा होता है। ब्रह्मदत्त द्विवेदी उन्हीं में से एक थे वह नेता जिनके सामने कभी दुश्मन भी सिर झुकाते थे, 1990 का दशक बीजेपी के उभार का दौर था और ब्रह्मदत्त द्विवेदी उस दौर के सबसे प्रभावशाली चेहरों में शामिल थे। हालात ऐसे थे कि छोटे-बड़े नेता उनसे दोस्ती को अपना राजनीतिक कवच मानते थे। सत्ता पक्ष ही नहीं, विपक्ष में भी उनका अलग सम्मान था।
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लेकिन ब्रह्मदत्त द्विवेदी की पहचान का सबसे निर्णायक पल आया 2 जून 1995 को, जब लखनऊ के गेस्ट हाउस में लोकतंत्र शर्मसार हुआ। मायावती द्वारा समर्थन वापस लेने से नाराज़ सपा विधायकों और अतीक अहमद जैसे बाहुबली नेताओं ने गेस्ट हाउस को घेर लिया। पानी, और फोन के तार काट दिए गए। हथियारों से लैस गुंडे मायावती को बाहर निकालने की धमकी दे रहे थे तभी एंट्री होती ब्रह्मदत्त द्विवेदी की मायावती को बचाने वाले ब्रह्मदत्त द्विवेदी ही थे जो अपने गेस्ट हाउस से निकलकर अकेले सपाई गुंडों से भिड़ गए थेउन्होंने अकेले ही सपा समर्थित गुंडों का सामना किया और मायावती की जान की ढाल बनकर खड़े हो गए।
यहीं से वे सिर्फ एक भाजपा नेता नहीं, बल्कि मायावती के लिए “राजनीतिक संरक्षक” बन गए। कहा जाता है कि इसी घटना के बाद मायावती ने उन्हें इतना सम्मान दिया कि 1997 में भाजपा–बसपा गठबंधन की सरकार बनने पर ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव केवल ब्रह्मदत्त द्विवेदी के नाम पर सहमति जताई।लेकिन नियति ने उन्हें सत्ता का शिखर देखने नहीं दिया।1997 में गैंगस्टर–राजनेता मुख्तार अंसारी के करीबी संजीव माहेश्वरी ‘जीवा’ ने उनकी हत्या कर दी। ब्रह्मदत्त द्विवेदी की मौत के बाद मायावती का फूट-फूट कर रोई बाद में उनकी पत्नी जब चुनाव मैदान में उतरीं, तो मायावती ने उन्हें “भाई की पत्नी” बताकर वोट मांगे और उनके खिलाफ कोई उम्मीदवार तक खड़ा नहीं किया।ब्रह्मदत्त द्विवेदी आज सत्ता के इतिहास में भले मुख्यमंत्री के रूप में दर्ज न हों,लेकिन उत्तर प्रदेश की आत्मा में वे उस नेता के रूप में दर्ज हैं


