उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचाने वाला बड़ा आदेश सामने आया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सबसे भरोसेमंद अफसरों में गिने जाने वाले तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी पर अब अदालत की तलवार लटक गई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देश पर संभल की स्थानीय अदालत ने शाही जामा मस्जिद–हरिहर मंदिर सर्वे के दौरान हुई हिंसा मामले में अनुज चौधरी, कोतवाल अनुज तोमर और 15–20 पुलिसकर्मियों पर FIR दर्ज करने का आदेश दे दिया है।
मामला 24 नवंबर 2024 का है, जब संभल में शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हिंसा भड़क गई थी। हालात इतने बिगड़े कि चार लोगों की मौत हो गई और कई लोग घायल हुए। नखासा क्षेत्र के खग्गू सराय निवासी आलम (23) को गोली लगी थी। परिजनों का दावा है कि आलम उस दिन बेकरी प्रोडक्ट बेचने निकला था और डर के कारण उसका इलाज निजी अस्पताल में गुपचुप कराया गया। आलम के पिता की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट विभांशु सुधीर ने माना कि मामले में गंभीर सवाल हैं। अदालत ने कहा कि पुलिस की रिपोर्ट समय पर पेश नहीं की गई करीब एक साल में 15 तारीखें पड़ीं शुरुआती महीनों में पुलिस का रवैया ढुलमुल रहा इसके बाद कोर्ट ने साफ आदेश दिया सभी नामजद पुलिसकर्मियों पर मुकदमा दर्ज हो और 7 दिन में रिपोर्ट पेश की जाए।
सरकार द्वारा गठित न्यायिक जांच आयोग पहले ही अपनी 450 पन्नों की रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी को सौंप चुका है। रिपोर्ट में कहा गया कि संभल हिंसा आकस्मिक नहीं थी यह एक पूर्व-नियोजित साजिश थी हिंसा में विदेशी हथियारों के इस्तेमाल के संकेत मिले क्षेत्र की डेमोग्राफी में बदलाव जैसे गंभीर पहलुओं पर भी सवाल उठाए गए क्यों है यह कार्रवाई अहम? यह पहला मौका है जब संभल हिंसा मामले में मौके पर तैनात पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सीधे FIR का आदेशआया है। इसलिए इसे अब तक की सबसे बड़ी और निर्णायक कार्रवाई माना जा रहा है। संभल हिंसा केस अब सिर्फ सांप्रदायिक या कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गया है।यह मामला अब जवाबदेही, पुलिस कार्रवाई,और सरकारी तंत्र की भूमिका पर सीधे सवाल खड़े कर रहा है।अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि सरकार और पुलिस इस अदालती आदेश पर आगे क्या कदम उठाती है।





