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मायावती की भरी हुंकार! कांप गया रावण ! अखिलेश और बीजेपी के छूटे पसीने !

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब-जब मायावती बोलती हैं, सियासी जमीन हिलती है। अपने जन्मदिन के मौके पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने जो कहा, वह सिर्फ एक बयान नहीं बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव का राजनीतिक शंखनाद है। यह हुंकार विपक्ष के लिए चेतावनी है और बहुजन समाज के लिए संदेश—कि मायावती अभी खत्म नहीं हुई हैं।चार बार की मुख्यमंत्री मायावती ने साफ शब्दों में ऐलान कर दिया कि 2027 का चुनाव बीएसपी अकेले दम पर लड़ेगी, न कोई गठबंधन, न कोई समझौता।

यह ऐलान सीधे-सीधे अखिलेश यादव के PDA फॉर्मूले और चंद्रशेखर आज़ाद रावण की उभरती दलित राजनीति पर करारा प्रहार है। मायावती ने बिना नाम लिए, लेकिन इशारों में साफ कर दिया कि चंद्रशेखर आज़ाद जैसे नेता बहुजनों को गुमराह कर रहे हैं। यह पहला मौका है जब मायावती ने इतनी स्पष्टता से नए दलित नेतृत्व को चुनौती दी है। उनका संदेश साफ है— दलित आंदोलन कोई इंस्टाग्राम रील नहीं, यह सत्ता और नीति से चलता है। मायावती का मानना है कि भावनात्मक राजनीति और प्रतीकात्मक विरोध से दलितों को सत्ता नहीं मिलती। सत्ता से ही सुरक्षा, सम्मान और अधिकार मिलते हैं—और यही बसपा की मूल विचारधारा रही है। अखिलेश यादव का PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूला मायावती की नजर में राजनीतिक छलावा है। उन्होंने गेस्ट हाउस कांड से लेकर दलित अपमान तक का जिक्र कर यह याद दिलाया कि सपा का इतिहास दलितों के लिए कभी सुरक्षित नहीं रहा।


मायावती ने यह भी साफ किया कि बसपा ने यादव समाज को भी कभी हाशिये पर नहीं डाला, जबकि सपा ने सत्ता में रहते हुए सिर्फ “अपने लोगों” का ध्यान रखा।उनका तंज तीखा था— PDA का नारा लगाने वाले, दलितों की पीड़ा पर कभी ईमानदार नहीं रहे।मायावती ने एक बार फिर 2007 की याद दिलाई—जब सर्वजन की राजनीति ने बसपा को पूर्ण बहुमत दिलाया था। ब्राह्मण समाज की उपेक्षा, क्षत्रिय समाज की नाराजगी और जाट युवाओं के मुद्दों को उठाकर उन्होंने संकेत दे दिया कि बसपा फिर उसी फॉर्मूले पर लौट रही है। यह बयान बीजेपी के लिए भी चिंता का विषय है, क्योंकि अगर ऊंची जातियों का वोट बसपा की ओर खिसकता है, तो सियासी गणित पूरी तरह बदल सकता है। मायावती ने खुद को एक बार फिर संवैधानिक और संतुलित नेता के रूप में पेश किया। मंदिर, मस्जिद, चर्च—सबकी सुरक्षा का दावा करते हुए उन्होंने सपा को “गुंडा-माफिया राज” का प्रतीक बताया। यह बयान उन मतदाताओं के लिए संकेत है जो कट्टर राजनीति से ऊब चुके हैं और स्थिर शासन चाहते हैं।“मरते दम तक संघर्ष”—यह सिर्फ भावनात्मक वाक्य नहीं, बल्कि यह मायावती की राजनीतिक जिद का ऐलान है। ईवीएम पर सवाल उठाकर उन्होंने यह भी संकेत दे दिया कि अगर हार हुई तो उसे चुपचाप स्वीकार नहीं किया जाएगा।

राजनीतिक विश्लेषक भले ही मायावती को कमजोर आंक रहे हों, लेकिन इतिहास गवाह है— मायावती को अंडरएस्टिमेट करना भारी पड़ सकता है। अगर दलित वोट बैंक एकजुट होता है, और ऊंची जातियों का एक हिस्सा बसपा की ओर लौटता है, तो न चंद्रशेखर की राजनीति बचेगी और न अखिलेश का PDA प्रयोग।अब इस पुरे खबर का निष्कर्ष क्या है तो वो भी आप जान लीजिये ,,मायावती ने साफ कर दिया है—न चंद्रशेखर उनकी चुनौती हैं,,न अखिलेश का PDA,,न कांग्रेस कोई फैक्टर ,,,2027 की लड़ाई में मायावती खुद को फिर से बहुजन सत्ता की अकेली दावेदार के रूप में पेश कर चुकी हैं। अब देखना यह है कि यह हुंकार सिर्फ मंच तक सीमित रहती है या उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर 2007 की गूंज सुनाई देती है। वहीं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने पोस्ट में लिखा- “उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं.” उन्होंने आगे कहा, “भगवान श्री राम आपको लंबी उम्र और अच्छा स्वास्थ्य दें.”अखिलेश यादव ने कहा, “आदरणीय मायावती जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं.

उनके स्वस्थ, स्वतंत्र जीवन और सार्थक सक्रियता के लिए अनंत शुभकामनाएं.” साथ ही उन्होंने ने कहा, ” आपने (मायावती) अपने पूरे जीवन में शोषित, वंचित, पीड़ित, उपेक्षित और अपमानित समाज की गरिमा, सम्मान और अधिकारों के लिए प्रभावशाली ताकतों के खिलाफ दिन-रात लगातार संघर्ष किया है, और जिस तरह से उन्होंने संविधान विरोधी BJP और उनके सहयोगियों और साथियों को चुनौती दी है, यह लगातार जारी रहे, इसी कामना के साथ, एक बार फिर उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं.” मायावती ने दलितों को याद कराते हुए भावुक अंदाज में कहा कि “समाजवादी पार्टी के शासन के दौरान, गुंडों, माफियाओं और अपराधियों का राज था. दलितों का सबसे ज़्यादा शोषण हुआ. 2 जून, 1995 को लखनऊ गेस्ट हाउस में BSP ने SP के साथ गठबंधन तोड़ने के बाद, हजारों सपाई गुंडों ने सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करके मुझे जान से मारने की कोशिश की. यह बात किसी से छिपी नहीं है. उनके शासन में, सिर्फ उनके अपने समुदाय को फायदा होता है, और मुसलमानों का भी शोषण होता है. उनके तथाकथित PDA का यही मतलब है.”

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