पुलिस कटघरे में पुलिस की शर्तें,पीड़िता की मजबूरी थाने–चौकी के चक्कर और लूट की धारा हटाने का दबाव
लखनऊ थाना इंदिरा नगर क्षेत्र से पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े करने वाला एक गंभीर मामला सामने आया है। कोमल सिटी के पास हुई मारपीट और लूट की घटना में पीड़िता का आरोप है कि इंस्पेक्टर इंदिरा नगर ने मुकदमा दर्ज करने से साफ इनकार कर दिया और तहरीर बदलने का दबाव बनाया।
बेटे को घेरकर पीटा, दोस्त को भी नहीं छोड़ा
पीड़िता के अनुसार उनका बेटा हिमांशु अपने दोस्तों के साथ सामान खरीदने गया था। आरोप है कि पहले से घात लगाए बैठे दबंगों ने हिमांशु पर हमला कर दिया और उसकी बेरहमी से पिटाई की। जब उसके दोस्त शाहनवाज,कृष्ण उसे बचाने आए, तो आरोपियों ने उन्हें भी बुरी तरह पीट दिया।
₹500 छीने जाने का आरोप, फिर भी लूट की FIR नहीं

पीड़िता का कहना है कि उन्होंने अपने बेटे को सामान खरीदने के लिए पैसे दिए थे। मारपीट के दौरान दबंग ₹500 नकद छीनकर भाग गए। यह बात पहली तहरीर में साफ-साफ लिखी गई थी, इसके बावजूद इंस्पेक्टर ने इसे लूट मानने से इनकार कर दिया और FIR दर्ज नहीं की।
तहरीर बदलो, तभी मुकदमा लिखेंगे
पीड़िता का गंभीर आरोप है कि थाना इंदिरा नगर और तकरोही चौकी के चक्कर लगवाए गए। इंस्पेक्टर का साफ कहना था कि जब तक तहरीर बदली नहीं जाएगी, मुकदमा दर्ज नहीं होगा। लूट की बात हटाने का दबाव बनाया गया और पुलिस ने मामले की कोई मौके की जांच तक नहीं की।
मजबूरी में बदली गई तहरीर

लगातार परेशान किए जाने के बाद पीड़िता को मजबूरी में बदली हुई तहरीर देनी पड़ी, जिसकी प्रति अब सामने आई है। सवाल यह है कि जब कानून पीड़ित की बात सुनने के लिए बना है, तो फिर तहरीर पुलिस के कहने पर क्यों बदली गई?
पहले भी हो चुकी है मारपीट, उल्टा बेटे पर लिखा गया था मुकदमा

पीड़िता का कहना है कि यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी इन्हीं दबंगों ने उनके बेटे के साथ मारपीट की थी, लेकिन उस वक्त थाने में शिकायत करने पर उल्टा पीड़िता के बेटे पर ही मुकदमा दर्ज कर दिया गया था। अब एक बार फिर वही रवैया दोहराया गया।
इंस्पेक्टर पर सवाल: क्या कानून तहरीर से नहीं, मर्जी से चलेगा?
सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि
क्या इंस्पेक्टर के कहने पर तय होगा कि लूट हुई या नहीं?
क्या ₹500 छीने जाना लूट नहीं माना जाएगा?
और क्या पीड़ित को न्याय पाने के लिए तहरीर बदलनी पड़ेगी?
कमिश्नरेट पुलिस की भूमिका पर सवाल
यह पूरा मामला लखनऊ कमिश्नरेट पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अगर पीड़ित की लिखित शिकायत के बावजूद FIR दर्ज नहीं होती, तो आम नागरिक आखिर न्याय के लिए कहां जाए?
अब नजर वरिष्ठ अधिकारियों पर
फिलहाल देखना यह है कि
क्या लखनऊ कमिश्नरेट पुलिस इस मामले का संज्ञान लेगी?
क्या इंस्पेक्टर और चौकी प्रभारी की भूमिका की जांच होगी?
या फिर पीड़ितों को यूं ही थानों के चक्कर काटने पड़ेंगे?





