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क्या दंगारोपी उमर खालिद को जमानत मिलनी चाहिए? जस्टिस चंद्रचूड़ ने दिया ऐसा जवाब, जिसने छेड़ दी बहस –

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क्या किसी शख्स को राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए लंबे वक्त तक जेल में रखा जा सकता है? अगर हां तो वो कौन सी 3 शर्तें हैं, जिनके उल्लंघन की आशंका में बेल देने से इनकार किया जा सकता है। देश के पूर्व चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड ने इस मुद्दे पर कानून से जुड़ी कई गूढ़ बातें कही हैं, जिन्हें हर किसी को जानना चाहिए।ं

जल्द सुनवाई का अधिकार अनुच्छेद 21 का हिस्सा

दिल्ली दंगों के आरोपी उमर ख़ालिद की लंबी हिरासत को लेकर उठे सवाल पर जस्टिस चंद्रचूड ने कहा कि जल्द सुनवाई का अधिकार अनुच्छेद 21 का हिस्सा है, ओर एक मूल अधिकार भी। जब तक कोई कठोर अपवाद लागू न हो, तब तक जमानत को ही संवैधानिक नियम माना जाना चाहिए। वे रविवार को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के एक सेशन में बोल रहे थे। इवेंट को होस्ट कर रहे पत्रकार वीर सांघवी ने दंगारोपी उमर खालिद की हिरासत का मुद्दा उठाया। इस पर चंद्रचूड़ ने लंबी अवधि तक हिरासत में रखे जाने को लेकर सृजन बेचैनी को स्वीकार किया।

अपनी अदालत की आलोचना नहीं कर रहा-जस्टिस चंद्रचूड़

उन्होंने कहा कि वे हाल ही तक देश के न्यायिक तंत्र का मुखिया रहे हैं। इसीलिए वे स्थगित मामलों पर टिप्पणी करने से बचते हैं। लेकिन यह बात तय है कि न्यायाधीशों को जमानत का फैसला तथ्यों एवं साक्ष्यों और उपलब्ध सामग्री के आधार पर ही करना चाहिए। उन्हें लोगों के दबाव या बाद की परिस्थित को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि ‘मैं अपनी अदालत की आलोचना नहीं कर रहा हूं लेकिन उस बारे में विस्तृत संवैधानिक सिद्धांत स्पष्ट हैं। वो ये हैं कि अगर कोई मुकदमा उचित समय में पूरा नहीं होता, तो हिरासत स्वयं दंड का रूप ले लेती है।’

जमानत नियम होनी चाहिए, अपवाद नहीं –

उन्होंने आगे कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में जल्द सुनवाई का अधिकार भी शामिल है। . ऐसे में जमानत को सीमित करने वाले कानून भी संवैधानिक गारंटी से ऊपर नहीं हो सकते हैं। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर मौजूदा परिस्थितियां इस तरह की हैं कि उनमें जल्द सुनवाई संभव नहीं है तो जमानत नियम होनी चाहिए, अपवाद नहीं। जमानत के दुरुपयोग को रोकने के लिए शर्तें लगा सकते हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा की दलील को परखें अदालतें –

पूर्व सीजेआई ने इस धारणा को कर दिया कि जमानत के मामलों में राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला अपने आप निर्णायक होना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस तरह की दलील आने पर अदालतों का कर्तव्य होता है कि वे इस बात को परखें कि क्या वास्तव में राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल जुड़ा भी है या नहीं? साथ ही क्या लंबी हिरासत उचित और समानुपाति रूप से सही है। ऐसा न करने पर लोग बिना दोष सिद्ध हुए वर्षों तक जेल में पड़े रहते हैं, जो न्याय व्यवस्था का भ्रष्ट रूप है।
चंद्रचूड़ ने जमानत से जुड़े तीन स्थापित सिद्धांतों को कार्यक्रम में दोहराया। उन्होंने कहा, ‘अगर आरोपी अपराध दोहरा सकता है , देश से फरार हो सकता है या फिर सबूत के साथ छेड़छाड़ कर सकता है। ऐसी आशंका होने पर आरोपी को जमानत देने से इनकार किया जा सकता है। ऐसा न होने पर आरोपी जमानत का हकदार होता है।’

दालत का काम जनभावनाओं को संतुष्ट करना नहीं

उन्होंने कहा कि अदालत का काम जनभावनाओं को संतुष्ट करना नहीं, बल्कि संवैधानिक संतुलन बनाए रखना होता है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने इस बात पे चेतावनी दी कि जमानत को सजा में बदल देना, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और न्याय प्रणाली दोनों को कमजोर बनाता है।

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण की इस विषय पर राय –

पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने यह बात कही है, जिन्होंने उमर खालिद की जमानत याचिका, न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी की बेंच को भेजी थी, जो पहले प्रधानमंत्री मोदी की विधि सचिव रह चुकी हैं और मोदी सरकार की इच्छाओं के विरुद्ध न जाने के लिए जानी जाती हैं।

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