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अखिलेश के ‘सप्त ऋषि’ और योगी का खेल : ब्राह्मण राजनीति में नया मोड़

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उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर करवट ले रही है। लंबे समय से जिस ब्राह्मण सियासत की गूंज बीजेपी के पक्ष में सुनाई देती रही, उसी सामाजिक वर्ग में अब बेचैनी और असंतोष की आवाज़ें तेज़ हो रही हैं। इसी सियासी खालीपन को भरने के लिए समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने ऐसा दांव चला है, जिसने बीजेपी के रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है सप्त ऋषि’ प्रयोगअखिलेश यादव ने साफ संकेत दे दिया है कि 2027 की लड़ाई सिर्फ PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसमें ब्राह्मण समाज की निर्णायक भूमिका भी होगी। यही कारण है कि उन्होंने सात ऐसे ब्राह्मण चेहरों को आगे बढ़ाया है, जो संगठन, विचार और ज़मीन तीनों स्तरों पर मजबूत माने जाते हैं।

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पहला और सबसे अहम नाम माता प्रसाद पांडेय का है। दो बार विधानसभा अध्यक्ष रह चुके और वर्तमान नेता प्रतिपक्ष के रूप में अखिलेश का उन पर भरोसा यह बताता है कि सदन के भीतर योगी सरकार को घेरने की जिम्मेदारी किसे सौंपी गई है। यह संदेश साफ है अखिलेश अब अनुभव और सामाजिक स्वीकार्यता दोनों को साध रहे हैं।आईआईएम अहमदाबाद में प्रोफेसर रह चुके अभिषेक मिश्रा, अखिलेश के बौद्धिक और रणनीतिक सलाहकार हैं। वे उस नई राजनीति के प्रतिनिधि हैं, जहां डेटा, रणनीति और सामाजिक इंजीनियरिंग चुनाव का आधार बनती है।2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के किले में सेंध लगाने वाले सनातन पांडेय ने यह साबित किया कि जाति से आगे ज़मीनी पकड़ भी चुनाव जिताती है। पूर्वांचल में उनकी स्वीकार्यता सपा के लिए बड़ा हथियार बन रही है।घोसी उपचुनाव की जीत के बाद राजीव राय का कद तेजी से बढ़ा है।

संकट के समय अखिलेश के लिए ढाल बनकर खड़े रहने की उनकी छवि पार्टी के भीतर भरोसे का प्रतीक बन चुकी है।अयोध्या जैसे संवेदनशील क्षेत्र में ब्राह्मण समाज के बीच पैठ बनाना आसान नहीं है, लेकिन पवन पांडेय इस दिशा में सपा के लिए नई जमीन तैयार कर रहे हैं।पूजा शुक्ला का संघर्ष और संतोष पांडेय की धार्मिक पकड़ ब्राह्मण समाज में सपा की स्वीकार्यता बढ़ाने का काम कर रही है। यह संकेत है कि अखिलेश सिर्फ सत्ता नहीं, सामाजिक संतुलन भी साधना चाहते हैं।


इन सात चेहरों के जरिए अखिलेश यादव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि 2027 की लड़ाई सिर्फ सरकार बदलने की नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन दोबारा गढ़ने की जंग होगी।यही वजह है कि शिवपाल यादव भी इस रणनीति से सहज दिख रहे हैं और पार्टी के भीतर संतुलन बनता नजर आ रहा है।


अब सवाल यह नहीं कि अखिलेश ने दांव चला या नहीं,सवाल यह है क्या बीजेपी इस बदले हुए सामाजिक गणित का तोड़ ढूंढ पाएगी?क्योंकि अगर ब्राह्मण नाराज़गी सियासी शक्ल ले गई,तो 2027 सिर्फ चुनाव नहीं, राजनीतिक भूचाल बन सकता है।

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