प्रयागराज के माघ मेले में मौनी अमावस्या स्नान को लेकर छिड़े विवाद पर अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) भी खुलकर सामने आ गया है। ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को संगम स्नान से रोके जाने के मामले में RSS के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार के बयान ने सियासी और धार्मिक हलकों में हलचल तेज कर दी है।उत्तर प्रदेश के चंदौली में एक कार्यक्रम के दौरान जब इंद्रेश कुमार से शंकराचार्य द्वारा लगाए गए दुर्व्यवहार के आरोपों पर सवाल किया गया, तो उन्होंने साफ शब्दों में कहा “कौन सा दुर्व्यवहार हुआ है? कुछ लोगों की आदत बन गई है कि वे सरकार और व्यवस्था के खिलाफ खड़े हो जाएं। मैं तो ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूं कि कोई भी व्यक्ति, कहीं भी हो, शांति और सद्भाव के साथ रहने की स्वतंत्रता पाए।”
माघ मेला कोई एक जगह तक सीमित नहीं – RSS
इंद्रेश कुमार ने आगे कहा कि माघ मेला देशभर में मनाया जाता है और ऐसा कोई तीर्थ नहीं है जहां इसका आयोजन न होता हो।
उन्होंने कहा— “हर जगह माघ मेला बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यहां भी उसी परंपरा के तहत आयोजन हुआ। अगर किसी ने शरारत करने की कोशिश की, तो उसे कोई परिणाम नहीं मिला। जहां देवताओं और मानवता का वास होता है, वहां शैतानी और राक्षसी शक्तियां ज्यादा देर तक नहीं टिकतीं।”RSS नेता के इस बयान को शंकराचार्य के आंदोलन और सरकार विरोधी रुख पर सीधा संदेश माना जा रहा है।
कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?
18 जनवरी, मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती संगम में स्नान के लिए पहुंचे थे। लेकिन मेला प्रशासन ने उन्हें पालकी में बैठकर संगम जाने की अनुमति नहीं दी, जिसके बाद मामला बिगड़ गया।शंकराचार्य के समर्थकों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की हुई, और इसके विरोध में शंकराचार्य वहीं धरने पर बैठ गए।
धरना जारी, प्रशासन ने भेजा नोटिस
शंकराचार्य का धरना अब भी जारी है। उनका कहना है कि जब तक मेला प्रशासन सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगता, तब तक वे आश्रम में प्रवेश नहीं करेंगे।वहीं, मेला प्रशासन ने भी सख्त रुख अपनाते हुए उन्हें नोटिस जारी किया है, जिसमें 24 घंटे के भीतर यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि वे आधिकारिक रूप से शंकराचार्य हैं।
बढ़ता जा रहा है टकराव
एक ओर शंकराचार्य अपनी धार्मिक गरिमा और अधिकारों की बात कर रहे हैं, तो दूसरी ओर प्रशासन और अब RSS के बयान से साफ हो गया है कि यह मामला सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सत्ता और व्यवस्था से टकराव का रूप ले चुका है।



