उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस वक्त सिर्फ़ सत्ता की नहीं, सनातन की परिभाषा की लड़ाई चल रही है। एक तरफ़ गोरखनाथ पीठ से निकले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जिनकी पहचान हिंदुत्व, कठोर प्रशासन और बुलडोज़र राजनीति से बनी। दूसरी तरफ़ ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जो खुद को सनातन धर्म का प्रहरी बताते हैं। लेकिन सवाल सिर्फ़ दो व्यक्तियों का नहीं है। सवाल यह है कि क्या योगी आदित्यनाथ को साधु-संत और ब्राह्मण विरोधी साबित करने की साज़िश चल रही है? क्या दिल्ली दरबार उत्तर प्रदेश में एक नया नॉरेटिव गढ़ रहा है? और क्या बीजेपी के भीतर ही योगी को कमजोर करने के लिए शंकराचार्य विवाद को हथियार बनाया गया है? आज माघ मेला नहीं,आज संगम नहीं, आज मुद्दा है योगी बनाम सिस्टम।
प्रयागराज माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन स्नान को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक और वैचारिक युद्ध में बदल चुका है। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए, बात धरने तक पहुँची और फिर बयानबाज़ी उस स्तर पर पहुँची जहाँ इतिहास के सबसे विवादित नाम उछाले जाने लगे। अविमुक्तेश्वरानंद ने योगी आदित्यनाथ को “औरंगज़ेब से भी बदतर” बताया “सनातन विरोधी” कहा और यहां तक कह दिया कि योगी हिंदू परंपराओं को कमजोर कर रहे हैं ,,यह कोई सामान्य आरोप नहीं थे। यह सीधे योगी की कोर हिंदुत्व छवि पर हमला था। योगी आदित्यनाथ ने नाम नहीं लिया, लेकिन संदेश इतना साफ़ था कि किसी अनुवाद की ज़रूरत नहीं थी।
“धर्म का चोला ओढ़कर कुछ कालनेमि सनातन धर्म को कमजोर करना चाहते हैं।” कालनेमि वही राक्षस जो साधु का वेश धरकर रामभक्तों को भ्रमित करता है। योगी ने साफ़ कर दिया कि सन्यासी की कोई निजी संपत्ति नहीं होती,, धर्म और राष्ट्र ही उसकी पूंजी होती है, और जो धर्म के विरुद्ध आचरण करता है, वह सनातन परंपरा का प्रतिनिधि नहीं हो सकता,,यह बयान सिर्फ़ संत पर नहीं था, यह पूरे उस नॉरेटिव पर था जो योगी को खलनायक बनाने में लगा है।
मामला तब और गंभीर हो गया जब प्रशासन ने अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस थमा दिया,, और सरकारी दस्तावेज़ में सुप्रीम कोर्ट का हवाला देकर उन्हें “शंकराचार्य” मानने से इनकार कर दिया यहीं से कहानी बदली।यह अब सिर्फ़ संत बनाम सरकार नहीं रहा, यह बन गया आस्था बनाम सत्ता का संघर्ष।समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, राहुल गांधी, अखिलेश यादव सबने इसे “सनातन का अपमान” बताया। लेकिन असली धमाका तब हुआ जब केशव प्रसाद मौर्य खुलकर अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में आ गए। केशव ने कहा “मैं गुरु के चरणों में प्रणाम करता हूँ। वे पूज्य हैं, भगवान स्वरूप हैं।”इसके बाद बदलापुर से बीजेपी विधायक रमेश चंद्र मिश्रा और कई अन्य नेता ,,खुले तौर पर केशव की “हिंदुत्व ब्रिगेड” में शामिल होते दिखे।इसके आलावा कई संत अनिरुद्याचार्य जैसे बाबा भी समर्थन में आ गए है ,अब सवाल उठता है क्या यह सिर्फ़ श्रद्धा है,या योगी के खिलाफ अंदरूनी मोर्चेबंदी?लेकिन इस पूरी घटना पर आरएसएस का रुख बिल्कुल स्पष्ट है ,RSS के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार ने साफ़ कहा “संत के साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं हुआ। कुछ लोगों की आदत होती है व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने की। शैतानी शक्तियाँ ज़्यादा देर टिकती नहीं।
”RSS ने नाम नहीं लिया,लेकिन यह भी साफ़ कर दिया कि योगी को कमजोर करने वालों को संघ पसंद नहीं करेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह कोई इकलौता विवाद नहीं है।क्रम देखिए ठाकुरवाद का नॉरेटिव कफ सिरप घोटाला सीधे योगी के विभाग को घसीटा गया SIR विवाद पंकज चौधरी ने जिम्मेदारी योगी पर डाली, मंत्रिमंडल बदलाव — 70% मंत्रियों की छुट्टी की चर्चा,, ब्राह्मण विरोधी और साधु विरोधी टैग,, मणिकर्णिका घाट पर मूर्तियां तुड़वाने का आरोप ,हर मोर्चे पर एक ही लक्ष्य योगी की छवि को कमजोर करना,,अब सवाल सबसे बड़ा है। क्या पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाना महज़ संयोग था? या यह वही कंट्रोल मैकेनिज़्म है, जिसकी चर्चा पहले होती थी? जब प्रधानमंत्री कहते हैं— “राष्ट्रीय अध्यक्ष मेरा बॉस है” तो संदेश साफ़ है प्रदेश अध्यक्ष, मुख्यमंत्री से ऊपर और यही वह रेखा है जो अब योगी के चारों ओर खींची जा रही है। अब इस यह विवाद न तो सिर्फ़ योगी बनाम शंकराचार्य है,न ही सिर्फ़ माघ मेला का। यह लड़ाई है कौन हिंदुत्व का चेहरा होगा? कौन सत्ता के केंद्र में रहेगा? और क्या योगी आदित्यनाथ को 2027 से पहले ही कमजोर कर दिया जाएगा? उत्तर प्रदेश की राजनीति अब सिर्फ़ लखनऊ में नहीं, दिल्ली के गलियारों में तय हो रही है। और योगी…अब सिर्फ़ मुख्यमंत्री नहीं, एक नॉरेटिव की लड़ाई लड़ रहे हैं। हालाँकि योगी के इस लड़ाई में बीजेपी का भले ही कोई बड़ा चेहरा खुलकर सामने न आया हो लेकिन आरएसएस ,कन्हैया मित्तल ,राम भद्राचार्य ,आदि कई संत खुलकर योगी के लिए मैदान में है





