उत्तर प्रदेश की राजनीति इस समय किसी शांत नदी की तरह नहीं बह रही, बल्कि भीतर ही भीतर ऐसा तूफान समेटे हुए है जो कभी भी सतह फाड़कर बाहर आ सकता है। बीते दो दिनों में जो घटनाएं घटी हैं, उन्होंने यह साफ कर दिया है कि यूपी की सत्ता सिर्फ़ विकास और चुनावी रणनीति की नहीं, बल्कि वर्चस्व, नियंत्रण और नेतृत्व की लड़ाई बन चुकी है। मंच से सब ठीक दिखाने की कोशिश हो रही है, लेकिन बंद कमरों में सवाल इतने तीखे हैं कि सत्ता के गलियारों में बेचैनी साफ महसूस की जा सकती है। कल देश के गृहमंत्री अमित शाह का लखनऊ आना औपचारिक तौर पर यूपी दिवस के कार्यक्रम से जोड़ा गया, लेकिन राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह दौरा किसी उत्सव से ज्यादा संकट प्रबंधन का हिस्सा था। प्रदेश कार्यालय में करीब पचास मिनट तक चली बंद कमरे की बैठक ने कई संकेत छोड़ दिए।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी, महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह और दोनों उपमुख्यमंत्री जब एक साथ बैठे, तो यह सिर्फ़ शिष्टाचार मुलाकात नहीं थी। सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में सरकार और संगठन के बीच बढ़ती दूरी, मंत्रिमंडल फेरबदल, अविमुक्तेश्वर नन्द महाराज से टकराव और 2027 के मिशन को लेकर खुलकर चर्चा हुई। कहा जा रहा है कि कुछ मुद्दों पर माहौल इतना गर्म हो गया कि बातचीत सामान्य दायरे से बाहर चली गई। अमित शाह ऐसे नेता माने जाते हैं जिनकी हर मुलाकात के राजनीतिक अर्थ निकाले जाते हैं। यूपी के भूगोल और सियासत से उनकी गहरी समझ किसी से छिपी नहीं है। 2014 में अस्सी में अस्सी का नारा देने वाले शाह जब मंच से योगी की तारीफ़ कर रहे थे, उसी समय भीतर यह संदेश भी दे रहे थे कि सरकार और संगठन के बीच टकराव अब और नहीं चल सकता। अविमुक्तेश्वर नन्द वाले प्रकरण पर योगी को स्पष्ट सलाह दी गई कि मामले को जल्द निपटाया जाए, ताकि डैमेज कंट्रोल हो सके। इसका मतलब साफ था—संघ और शीर्ष नेतृत्व को खुला संघर्ष मंजूर नहीं है। इसी बीच उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का बयान राजनीति में नई दरार लेकर आया। जिस समय मुख्यमंत्री योगी अविमुक्तेश्वर नन्द के खिलाफ सख्त रुख अपनाए हुए हैं, उसी समय केशव मौर्य सार्वजनिक रूप से उनके समर्थन में खड़े नजर आए। उन्होंने अविमुक्तेश्वर नन्द को भगवान तुल्य बताते हुए उनके चरणों में प्रणाम करने की बात कही।
सवाल उठना लाजिमी था कि जब एक ही पार्टी की सरकार है, तो मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के सुर इतने अलग क्यों हैं। सियासी गलियारों में इसे आस्था नहीं, बल्कि आकांक्षा का प्रदर्शन माना जा रहा है। केशव मौर्य की मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा कोई छिपी हुई बात नहीं रही और यही वजह है कि उनके हर कदम को अब नेतृत्व की दौड़ से जोड़कर देखा जा रहा है। इधर संगठन की भूमिका भी लगातार सवालों के घेरे में है। दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट ने उस चिंगारी को हवा दे दी, जिसमें बताया गया कि कानपुर में प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने करीब पचास मिनट का भाषण दिया, लेकिन पूरे भाषण में एक बार भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम नहीं लिया।
भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जिक्र बार-बार हुआ, लेकिन प्रदेश सरकार के कामकाज का संदर्भ गायब रहा। संगठन के भीतर यह चर्चा तेज हो गई कि जब योजनाएं सरकार के माध्यम से जमीन पर उतरती हैं, तो मुख्यमंत्री का उल्लेख तक न होना किस बात का संकेत है। इसे सरकार और संगठन के बीच बढ़ती खाई के रूप में देखा जा रहा है। इन सबके बीच आरएसएस की भूमिका सबसे अहम मानी जा रही है। मथुरा में संघ प्रमुख मोहन भागवत का लगातार आठ दिनों तक रुकना और बड़ी बैठकें करना इस बात का संकेत है कि संघ पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर बनाए हुए है। वहीं नितिन नवीन के साथ चल रही योगी की बैठक को भी इसी सामंजस्य की कवायद के रूप में देखा जा रहा है। अगर यह संतुलन नहीं बना, तो पार्टी के भीतर हालात विस्फोटक हो सकते हैं। दिल्ली के गलियारों में एक और घटना को लेकर भी फुसफुसाहट तेज है। नितिन नवीन की ताजपोशी के दौरान जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत हो रहा था, तब सभी मुख्यमंत्री हाथ जोड़कर खड़े नजर आए, लेकिन योगी आदित्यनाथ बिना हाथ जोड़े खड़े रहे। इसे किसी ने बॉडी लैंग्वेज कहा, तो किसी ने संदेश।
कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री इस संकेत से संतुष्ट नहीं थे और यही वजह है कि दिल्ली की टीम इस समय केशव मौर्य और पंकज चौधरी को ज्यादा तवज्जो देती दिखाई दे रही है। बीजेपी के इतिहास पर नजर डालें तो यह पार्टी अचानक बड़े फैसले लेने से नहीं हिचकती। गुजरात में पूरा मंत्रिमंडल बदल देना हो या शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे जैसे दिग्गजों को साइडलाइन करना—सब कुछ वक्त और जरूरत के हिसाब से हुआ है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में चल रही यह खींचतान सिर्फ़ अंदरूनी मतभेद नहीं, बल्कि आने वाले बड़े फैसलों की आहट मानी जा रही है। आज यूपी की राजनीति में सवाल सिर्फ़ इतना नहीं है कि योगी मजबूत हैं या कमजोर, बल्कि यह है कि क्या सरकार और संगठन एक सुर में रह पाएंगे। अगर यह सामंजस्य लंबे समय तक नहीं बना, तो भारतीय जनता पार्टी के भीतर ऐसा राजनीतिक विस्फोट हो सकता है, जिसकी गूंज सिर्फ़ लखनऊ तक नहीं, बल्कि दिल्ली और नागपुर तक सुनाई देगी। अब सबकी निगाहें अगले कदम पर टिकी हैं, क्योंकि वही तय करेगा कि उत्तर प्रदेश में सत्ता का संतुलन कायम रहता है या इतिहास खुद को दोहराने की तैयारी कर चुका है।





