उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए नियमों के विरोध में लखनऊ के कुम्हरावां मंडल से बीजेपी के 11 पदाधिकारियों ने सामूहिक रूप से इस्तीफा दे दिया है, इस घटनाक्रम से पार्टी के भीतर आंतरिक कलह की आशंका बढ़ गई है।
कुम्हरावां मंडल से सामूहिक इस्तीफा
जिला बीजेपी के कुम्हरावां मंडल के मंडल महामंत्री अंकित तिवारी ने UGC के नए कानून के विरोध में अपने सभी पदों से इस्तीफा दे दिया, उनके साथ मंडल के 10 अन्य पदाधिकारियों ने भी सामूहिक रूप से त्यागपत्र सौंपा है। यह मंडल 169 विधानसभा क्षेत्र, बख्शी का तालाब के अंतर्गत आता है।
पार्टी पर मूल सिद्धांतों से भटकने का आरोप
अपने इस्तीफे में अंकित तिवारी ने जिला अध्यक्ष को संबोधित करते हुए कहा कि पार्टी अपने प्रेरणास्रोत पंडित दीन दयाल उपाध्याय और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा स्थापित विचारधारा से भटक रही है, उन्होंने UGC कानून को पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व द्वारा उठाया गया एक “विनाशकारी कदम” बताया, जो देश और शिक्षा व्यवस्था के भविष्य के लिए हानिकारक है।
अंकित तिवारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पार्टी के विचारों का मिशन अब खोखला होता जा रहा है, इसी कारण वह न केवल पद छोड़ रहे हैं, बल्कि आगे किसी भी पार्टी कार्यक्रम में भाग नहीं लेंगे।

UGC का नया नियम क्या है?
यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने 15 जनवरी 2026 से देशभर में नए नियम लागू किए हैं। इन नियमों का उद्देश्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जाति, जेंडर या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर होने वाले भेदभाव को खत्म करना है, ये नियम 2012 के पुराने प्रावधानों की जगह लेंगे, जिन्हें UGC ने अब समय के अनुसार अपर्याप्त बताया है।
हर संस्थान में बनेगी ‘इक्विटी सेल’
नए नियमों के तहत हर सरकारी और निजी कॉलेज या यूनिवर्सिटी में एक Equity Cell बनाना अनिवार्य होगा। यदि किसी छात्र को भेदभाव का अनुभव होता है, तो वह इस सेल में शिकायत दर्ज करा सकेगा, संस्थान को शिकायत पर तुरंत कार्रवाई करनी होगी।
विवाद की जड़ क्या है?
OBC वर्ग को भेदभाव श्रेणी में शामिल करना
नए नियमों में OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) को भी जातिगत भेदभाव की श्रेणी में शामिल किया गया है, जनरल कैटेगरी के कुछ छात्रों और वर्गों का तर्क है कि OBC को पहले से आरक्षण जैसी सुविधाएं मिलती हैं, ऐसे में उन्हें इस श्रेणी में शामिल करना असंतुलन पैदा कर सकता है।
शिक्षा की गुणवत्ता और ग्लोबल रैंकिंग का मुद्दा
सोशल मीडिया और शैक्षणिक हलकों में यह भी बहस तेज है कि भारतीय विश्वविद्यालय पहले ही वैश्विक रैंकिंग में पीछे हैं। ऐसे में सरकार को नए नियम लाने के बजाय शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने पर ध्यान देना चाहिए, इसके अलावा, छात्रों का कहना है कि नए नियमों में झूठी शिकायतों पर कार्रवाई को लेकर स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं, जिससे इनका दुरुपयोग होने की आशंका है और इससे छात्रों के करियर पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।





