सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में भी यदि सरकारी योजनाओं का सही क्रियान्वयन और स्थानीय लोगों की सक्रिय सहभागिता हो, तो आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव रखी जा सकती है। इसका जीवंत उदाहरण विकासखंड डुंडा के सिंगोट गांव में देखने को मिल रहा है।
जिलाधिकारी प्रशांत आर्य ने श्री नागराजा मत्स्यजीवी उत्पादन सहकारी समिति द्वारा संचालित मत्स्य उत्पादन इकाई का स्थलीय निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने समिति के कार्यों की सराहना करते हुए इसे ग्रामीण आजीविका सृजन का सफल और अनुकरणीय मॉडल बताया। सहकारिता विभाग से जुड़ी यह समिति आज न केवल स्थानीय युवाओं को रोजगार उपलब्ध करा रही है, बल्कि आधुनिक तकनीक के माध्यम से ट्राउट मछली उत्पादन में आत्मनिर्भर बन चुकी है।

समिति द्वारा उत्पादित ट्राउट मछली की नियमित आपूर्ति आईटीबीपी मातली सहित जिले के स्थानीय बाजारों में की जा रही है। पहले जहां समिति मछली बीज के लिए विभाग पर निर्भर थी, वहीं अब प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद समिति स्वयं मछली बीज उत्पादन कर रही है। साथ ही अन्य उत्पादकों को मात्र 5 रुपये प्रति बीज की दर से बीज उपलब्ध कराया जा रहा है। मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के अंतर्गत समिति को मत्स्य विभाग से 44 लाख रुपये का ऋण स्वीकृत हुआ, जिसमें 50 प्रतिशत सब्सिडी प्रदान की गई। वर्तमान में समिति से 34 सदस्य प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं, जबकि 14 अन्य लोगों को भी रोजगार उपलब्ध कराया गया है।
गांव में आजीविका सृजन को बढ़ावा देने के लिए 20 ट्राउट मछली टैंक और 6 स्थानीय मछली टैंक स्थापित किए गए हैं। इससे प्रतिवर्ष लगभग 20 से 22 लाख रुपये का उत्पादन हो रहा है। ट्राउट मछली 60 हजार रुपये प्रति क्विंटल तथा स्थानीय मछली 300 रुपये प्रति किलो की दर से बेची जा रही है। निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी प्रशांत आर्य ने कहा कि यह एक अत्यंत सफल इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल है, जिसे मुख्यमंत्री मत्स्य संपदा योजना और राज्य सरकार की अन्य योजनाओं के समन्वय से विकसित किया गया है। उन्होंने बताया कि यहां पॉलीहाउस, हॉर्टिकल्चर और मत्स्यपालन का एक साथ सफल संचालन किया जा रहा है।





