वर्दी में अपराध की तस्वीरें, आदेशों के बावजूद क्यों नहीं रुक रही मनमानी?
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में पुलिस व्यवस्था की साख पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। सरकार और शीर्ष पुलिस अधिकारियों के सख्त निर्देशों के बावजूद कुछ पुलिसकर्मियों की कार्यशैली लगातार विवादों में बनी हुई है। ताजा मामला अंबेडकरनगर जिले से सामने आया है, जहां दो सिपाहियों की गिरफ्तारी ने बीते वर्षों की कई शर्मनाक घटनाओं की याद दिला दी है।
सोना दिलाने का झांसा, वर्दीधारियों ने उड़ाए दो लाख
अंबेडकरनगर में सोना उपलब्ध कराने के नाम पर एक युवक से दो लाख रुपये की ठगी का मामला उजागर हुआ है। चौंकाने वाली बात यह रही कि इस प्रकरण में कोई आम अपराधी नहीं, बल्कि पुलिस की वर्दी पहनने वाले सिपाही शामिल पाए गए।
मामला सामने आने के बाद पुलिस अधीक्षक अभिजीत आर. शंकर ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दोनों आरोपित सिपाहियों को निलंबित करने के साथ ही गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
सख्त कार्रवाई के बावजूद सवाल कायम
हालांकि प्रशासन की ओर से की गई कार्रवाई को सख्त माना जा रहा है, लेकिन यह घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों दोहराई जा रही हैं। क्या निलंबन और गिरफ्तारी से व्यवस्था में सुधार संभव हो पा रहा है, या फिर यह केवल तात्कालिक कदम बनकर रह जा रहे हैं?
राजधानी से लेकर जिलों तक, विवादों की लंबी फेहरिस्त
बीते कुछ वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें पुलिसकर्मियों पर गंभीर आरोप लगे। कहीं वाहन चेकिंग की आड़ में व्यापारियों से वसूली के आरोप लगे, तो कहीं जांच के नाम पर लाखों-करोड़ों की लूट की शिकायतें सामने आईं। राजधानी लखनऊ से लेकर अन्य जिलों तक, पुलिस की भूमिका को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।
क्या वर्दी का डर खत्म हो रहा है?
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाएं जनता के भरोसे को कमजोर करती हैं। वर्दी जिसे सुरक्षा और भरोसे का प्रतीक माना जाता है, अगर उसी पर सवाल उठने लगें तो कानून-व्यवस्था के लिए यह गंभीर चेतावनी है।
सुधार की जरूरत, निगरानी पर जोर
लगातार सामने आ रहे मामलों ने यह साफ कर दिया है कि केवल आदेश और निर्देश काफी नहीं हैं। जरूरत है जमीनी स्तर पर निगरानी, जवाबदेही तय करने और पुलिसकर्मियों की कार्यप्रणाली पर कड़ी नजर रखने की, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।





