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योगी ने तोड़ दिया विरोधियों का घमंड ! यूपी से दिल्ली तक हलचल तेज !

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यूजीसी के बहाने योगी आदित्यनाथ को ‘निपटाने’ की जो सियासी स्क्रिप्ट दिल्ली के पावर सेंटर में लिखी गई थी, वह ज़मीन पर आते‑आते फेल हो गई। और जैसे ही यह प्लान धराशायी हुआ, वैसे ही ‘मूड ऑफ द नेशन’ का मूड भी बदला‑बदला दिखने लगा।

इंडिया टुडे–सी वोटर के ताज़ा सर्वे में देश के अगले प्रधानमंत्री को लेकर जो सवाल पूछा गया, उसमें सबसे चौंकाने वाली बात यह नहीं थी कि 55% जनता आज भी नरेंद्र मोदी को पीएम के तौर पर देखना चाहती है—सबसे बड़ा सवाल यह था कि उस सर्वे से योगी आदित्यनाथ का नाम बड़ी ‘साफ़‑सुथरी चालाकी’ से गायब कर दिया गया। सवाल यह नहीं कि मोदी या राहुल गांधी कितने लोकप्रिय हैं, सवाल यह है कि मोदी के बाद सबसे मज़बूत चेहरे को पूछे जाने से ही क्यों बाहर कर दिया गया? इंडिया टुडे–सी वोटर के ताज़ा ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे ने एक बार फिर देश की राजनीति में छिपे पावर स्ट्रगल को सतह पर ला दिया है।

सर्वे कहता है कि 55% लोग नरेंद्र मोदी को ही अगला प्रधानमंत्री बनते देखना चाहते हैं, जबकि 29% लोग राहुल गांधी को पीएम के तौर पर देखना चाहते हैं। लेकिन इसी सर्वे का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश आंकड़ों में नहीं, बल्कि सवाल की बनावट में छिपा है। दरअसल, यह वही इंडिया टुडे ग्रुप है जिसने पहले किए गए एक सर्वे में जनता से पूछा था “मोदी के बाद कौन?” उस वक्त देश की जनता ने बिना किसी हिचक के 28% वोट के साथ योगी आदित्यनाथ को मोदी के बाद सबसे बड़ा दावेदार बताया था। दिलचस्प बात यह थी कि उसी सर्वे में अमित शाह, जो संगठन और सरकार दोनों पर मज़बूत पकड़ रखते हैं, योगी से महज़ एक प्रतिशत आगे या बराबरी की स्थिति में दिखे थे। यहीं से सवाल उठने लगे थे कि एक राज्य के मुख्यमंत्री होकर भी योगी आदित्यनाथ, पूरे देश के भाजपा संगठन के सबसे ताक़तवर रणनीतिकार अमित शाह को टक्कर कैसे दे रहे हैं? और तभी सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक यह चर्चा तेज़ हो गई कि मोदी के बाद अगर कोई स्वाभाविक चेहरा है, तो वह योगी आदित्यनाथ ही हैं। लेकिन इस बार खेल बदला हुआ है।

‘मोदी के बाद कौन’ वाला सवाल ही सर्वे से गायब कर दिया गया। उसकी जगह सीधे ‘देश का अगला प्रधानमंत्री कौन’ पूछा गया और विकल्पों में राहुल गांधी और ममता बनर्जी जैसे नेताओं को रखा गया—जिनका राष्ट्रीय स्तर पर जनाधार सीमित माना जाता है। वहीं योगी आदित्यनाथ, राजनाथ सिंह जैसे नामों को पूरी तरह बाहर कर दिया गया। यह महज़ संयोग नहीं माना जा सकता। खासकर तब, जब बीते कुछ सालों में योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रही। उसी इंडिया टुडे के एक सर्वे में देश के 36% लोगों ने योगी को ‘सबसे अच्छा मुख्यमंत्री’ बताया था, जबकि ममता बनर्जी को महज़ 13% समर्थन मिला था। 36 और 13 का यह फासला अपने आप में बहुत कुछ कहता है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज़ है कि यूजीसी विवाद के बहाने योगी आदित्यनाथ को घेरने और कमजोर दिखाने की एक बड़ी कोशिश की गई, लेकिन वह भी जनता के गुस्से के आगे टिक नहीं पाई। सामान्य वर्ग का सड़कों पर उतरना, ‘मोदी‑शाह तेरी खैर नहीं, योगी तुझसे बैर नहीं’ जैसे नारे—यह संकेत दे चुके हैं कि योगी अब सिर्फ एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा चेहरा बन चुके हैं। पीएम पद को लेकर अमित शाह और योगी आदित्यनाथ के बीच अदृश्य प्रतिस्पर्धा की चर्चा नई नहीं है। बीबीसी की एक विस्तृत रिपोर्ट में भी इस ‘शांत जंग’ का ज़िक्र हो चुका है। फर्क बस इतना है कि यह टकराव सार्वजनिक बयानबाज़ी में नहीं, बल्कि संगठनात्मक रणनीतियों में दिखता है। अमित शाह की ताक़त संगठन है।

यही वजह मानी जाती है कि वे हर राज्य, हर प्रदेश इकाई और हर अहम पद पर अपने भरोसेमंद लोगों को बैठाने में जुटे हैं। उत्तर प्रदेश में प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व के चयन तक—हर क़दम को 2029 के चुनाव के चश्मे से देखा जा रहा है। मक़सद साफ़ है: जब वक्त आए, तो पूरा संगठन एक सुर में बोले। लेकिन राजनीति सिर्फ संगठन से नहीं चलती, जनाधार भी उतना ही बड़ा हथियार होता है। और यहीं पर योगी आदित्यनाथ अमित शाह से आगे नज़र आते हैं। उत्तर प्रदेश के बाहर भी योगी की स्वीकार्यता, उनकी छवि और उनकी अपील कई राज्यों में शाह से ज़्यादा मानी जा रही है। यह बात योगी को भी पता है और शाह को भी। इन सबके बीच सबसे अहम भूमिका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मानी जा रही है।

राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि भाजपा आज भी संघ की सहमति के बिना कोई बड़ा फ़ैसला नहीं लेती। यह भी सच है कि जब‑जब भाजपा दबाव में आती है, संघ की भूमिका और मज़बूत हो जाती है। मौजूदा हालात में संघ के भीतर योगी आदित्यनाथ को लेकर सकारात्मक संकेतों की चर्चा ज़ोरों पर है। योगी की राजनीति संघ के मूल मंत्र से मेल खाती दिखाई देती है—‘पहले राष्ट्र, फिर धर्म’। योगी के भाषणों और फैसलों में यह लाइन बार‑बार झलकती है। यही वजह बताई जाती है कि संघ के एक बड़े वर्ग की पहली पसंद इस वक्त योगी आदित्यनाथ माने जा रहे हैं। मोदी और शाह को अलग‑अलग नहीं देखा जा सकता। दोनों दशकों पुराने साथी हैं और 2029 तक मोदी के नेतृत्व पर सार्वजनिक तौर पर कोई सवाल नहीं है। भाजपा भले ही 2047 और 2049 तक मोदी के नेतृत्व की बात करे, लेकिन राजनीतिक जानकार मानते हैं कि 2029 के बाद तस्वीर बदल सकती है।निष्कर्ष साफ़ है—इंडिया टुडे का यह सर्वे जितना आंकड़ों के बारे में है, उससे कहीं ज़्यादा उस सवाल के बारे में है जो पूछा ही नहीं गया। योगी आदित्यनाथ का नाम हटाना, दरअसल उनके बढ़ते कद की सबसे बड़ी स्वीकारोक्ति भी है। क्योंकि भारतीय राजनीति में अक्सर वही नाम सबसे पहले गायब किया जाता है, जिससे सबसे ज़्यादा डर होता है।

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