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UP में कांशीराम की विरासत पर सियासत, सपा-बसपा के बीच तेज हुई खींचतान

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आज बहुजन आंदोलन के प्रमुख नेता कांशीराम की जयंती के मौके पर उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर हलचल देखने को मिल रही है, राज्य की कई राजनीतिक पार्टियां इस दिन कार्यक्रम आयोजित कर रही हैं और यह सवाल चर्चा में है कि आखिर कांशीराम की राजनीतिक विरासत पर किसका अधिकार है।

राजधानी लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी की ओर से मान्यवर कांशीराम स्मारक में भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया, पार्टी के नेता और कार्यकर्ता बड़ी संख्या में वहां पहुंचे और कांशीराम को श्रद्धांजलि दी, बसपा के लिए कांशीराम की जयंती हमेशा खास मानी जाती है, क्योंकि उन्होंने ही इस पार्टी की स्थापना कर बहुजन राजनीति को नई दिशा दी थी।

दूसरी ओर समाजवादी पार्टी ने भी इस दिन को खास तरीके से मनाने का फैसला किया है, पार्टी नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश के सभी जिलों और महानगरों में निर्देश दिया है कि कांशीराम जयंती को PDA दिवस के रूप में मनाया जाए, PDA का मतलब है पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक, यह वही सामाजिक समीकरण है जिसे सपा आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

लखनऊ में सपा के जिला कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में मंच पर ज्यादातर स्थान बहुजन समाज के लोगों को दिया गया। पार्टी का उद्देश्य यह संदेश देना था कि दलित समाज उनके साथ खड़ा है और पार्टी उनकी राजनीतिक आवाज को मजबूत करना चाहती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव दलित वोट बैंक को साधने की रणनीति पर काम कर रहे हैं, पार्टी के नेताओं का कहना है कि दलितों से जुड़े मुद्दों और आरक्षण की लड़ाई को आगे बढ़ाने का काम सपा करेगी।

वहीं मायावती की अगुवाई वाली बसपा लगातार सपा पर निशाना साध रही है, बसपा का आरोप है कि सपा का यह पूरा अभियान केवल राजनीतिक दिखावा है और दलितों के असली मुद्दों से उसका कोई लेना-देना नहीं है।

2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट बैंक को लेकर नई रणनीतियां बन रही हैं, माना जा रहा है कि उस चुनाव में दलितों का एक हिस्सा सपा की तरफ गया था, इसी वजह से सपा अब 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए दलित वोटरों पर ज्यादा ध्यान दे रही है।

वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेंद्र शुक्ला का कहना है कि कांशीराम जयंती को PDA दिवस के रूप में मनाने का फैसला उत्तर प्रदेश की राजनीति को और दिलचस्प बना रहा है, एक तरफ बसपा इस मुद्दे पर सपा को घेर रही है, वहीं सपा को उम्मीद है कि अगर दलित वोट का कुछ हिस्सा भी उसके साथ आता है तो आने वाले चुनावों में उसे फायदा मिल सकता है।

कुल मिलाकर कांशीराम की जयंती इस बार सिर्फ श्रद्धांजलि का अवसर नहीं रही, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट बैंक को लेकर नई सियासी रणनीतियों का भी संकेत बन गई है, आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांशीराम की विरासत को लेकर चल रही यह सियासी खींचतान किस दिशा में जाती है।

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