उत्तर प्रदेश की राजनीति इस वक्त ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहां से आने वाला हर रास्ता सत्ता तक जाता है… लेकिन उस रास्ते की चाबी किसके हाथ में होगी, ये तय करेगा दलित वोट बैंक! और इसी दलित राजनीति के केंद्र में आज एक बार फिर गूंज रहा है एक नाम – मान्यवर कांशीराम! जी हां… कांशीराम की जयंती आते ही यूपी की राजनीति में अचानक हलचल तेज हो गई है। बीजेपी हो, कांग्रेस हो, समाजवादी पार्टी हो या फिर बसपा और आजाद समाज पार्टी… हर कोई कांशीराम को अपना बताने में लगा है। लेकिन सबसे दिलचस्प और सबसे तीखी लड़ाई अगर कहीं दिख रही है… तो वो है मायावती और चंद्रशेखर आजाद रावण के बीच।
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दरअसल कांशीराम सिर्फ एक नेता नहीं थे… वो एक विचार थे… एक आंदोलन थे… जिन्होंने दलित राजनीति को नई दिशा दी और उसी आंदोलन से निकली बसपा और मायावती। मायावती आज भी खुद को कांशीराम की असली राजनीतिक वारिस बताती हैं। यही वजह है कि वो बार-बार दलित समाज से अपील करती हैं कि कुछ लोग कांशीराम का नाम लेकर दलित वोट को बांटने की साजिश कर रहे हैं। कांशीराम जयंती के मौके पर मायावती की रैली में जिस तरह हजारों की संख्या में लोग पहुंचे… उसने एक बार फिर यह संदेश देने की कोशिश की कि दलित समाज का बड़ा हिस्सा अभी भी बसपा के साथ खड़ा है। लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है…बीते कुछ सालों में एक नया चेहरा तेजी से उभरा है – चंद्रशेखर आजाद रावण।भीम आर्मी से लेकर आजाद समाज पार्टी तक… चंद्रशेखर आजाद ने खासकर युवाओं और जमीनी दलित वर्ग के बीच अपनी मजबूत पकड़ बनाई है।उनका आक्रामक अंदाज… सड़क से लेकर संसद तक लड़ने की छवि… और हर छोटे बड़े मुद्दे पर खुलकर बोलने का तरीका… उन्हें नई पीढ़ी का दलित चेहरा बना रहा है।यही वजह है कि अब सवाल उठने लगा है कि: क्या दलित राजनीति में एक नया पावर सेंटर बन रहा है?क्या चंद्रशेखर आजाद धीरे-धीरे मायावती के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगा रहे हैं?राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर दलित वोट दो हिस्सों में बंटता है तो सबसे बड़ा नुकसान बसपा को हो सकता है… और इसका सीधा फायदा समाजवादी पार्टी और बीजेपी को मिल सकता है।यानी लड़ाई सिर्फ नेतृत्व की नहीं है…लड़ाई विरासत की है… विचारधारा की है… और दलित राजनीति के भविष्य की है।अब सबसे बड़ा सवाल यही है…क्या कांशीराम की असली राजनीतिक विरासत मायावती के पास ही रहेगी?या फिर चंद्रशेखर आजाद रावण नई पीढ़ी के सहारे दलित राजनीति का नया चेहरा बन जाएंगे?क्योंकि यूपी की सत्ता का रास्ता आज भी दलित वोट से होकर जाता है…और जो कांशीराम की विरासत को समझेगा… वही 2027 की राजनीति में असली खेल करेगा।

