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आंबेडकर का दलित मुस्लिम एकता पर सबसे बड़ा डर क्या था

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देश की राजनीति में इस वक्त दलित-मुस्लिम एकता का नारा जोर-शोर से उछाला जा रहा है। कई नेता मंचों से कहते नजर आते हैं कि हमें मुसलमानों से कोई दिक्कत नहीं, हमारी लड़ाई सिर्फ ब्राह्मणवाद से है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जिन बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के नाम पर यह राजनीति की जा रही है, आखिर इस्लाम और मुस्लिम समाज को लेकर खुद अंबेडकर की सोच क्या थी? क्या अंबेडकर भी वही सोचते थे जो आज के कुछ दलित नेता कह रहे हैं, या उनकी राय इससे अलग थी?

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क्या अंबेडकर ने हिंदू-मुस्लिम रिश्तों पर कुछ ऐसी बातें कही थीं जो आज की राजनीति के नैरेटिव से मेल नहीं खातीं? आज हम आपको अंबेडकर की किताब “Pakistan or Partition of India” के आधार पर बताएंगे कि उन्होंने इस्लाम, मुस्लिम राजनीति और भारत के भविष्य को लेकर क्या तीखी और चौंकाने वाली बातें लिखी थीं, जिन्हें आज की राजनीति में अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपनी किताब “Pakistan or the Partition of India” में हिंदू-मुस्लिम संबंधों और उस समय की राजनीति का विश्लेषण किया था। यह किताब 1940 के दौर की परिस्थितियों को समझाने के लिए लिखी गई थी। अंबेडकर ने लिखा कि इस्लाम अपने अनुयायियों के बीच मजबूत भाईचारा बनाता है, लेकिन उनके अनुसार यह भाईचारा मुख्य रूप से मुसलमानों तक सीमित रहता है। उन्होंने यह भी कहा कि उस समय की राजनीति में धार्मिक पहचान कई बार राष्ट्रीय पहचान से ज्यादा प्रभाव डालती थी, जिसने दो-राष्ट्र सिद्धांत की बहस को भी ताकत दी। अंबेडकर का मकसद किसी धर्म के खिलाफ नफरत फैलाना नहीं था, बल्कि उस दौर की राजनीतिक और सामाजिक सच्चाइयों का विश्लेषण करना था ताकि देश के लिए सही रास्ता निकाला जा सके।संक्षेप में, अंबेडकर ने हिंदू-मुस्लिम रिश्तों को इतिहास, समाज और राजनीति के नजरिए से समझाने की कोशिश की थी।

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