उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस वक्त कुछ बड़ा पक रहा है… कुछ ऐसा जो बंद कमरों में तय हो रहा है, लेकिन जिसकी आहट लखनऊ के सत्ता गलियारों से निकलकर दिल्ली तक सुनाई दे रही है। सवाल बड़ा है – क्या बीजेपी में सब कुछ सामान्य है या फिर अंदर ही अंदर 2027 और 2029 की सबसे बड़ी राजनीतिक पटकथा लिखी जा रही है?कभी मुख्यमंत्री आवास पर मैराथन बैठकें, कभी बीजेपी कार्यालय में रणनीति, तो कभी RSS के साथ लगातार मंथन… लेकिन इसी बीच एक ऐसा घटनाक्रम हुआ जिसने राजनीतिक जानकारों को भी चौंका दिया।
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9 साल में पहली बार बीजेपी की सबसे ताकतवर कोर कमेटी की बैठक मुख्यमंत्री आवास की बजाय डिप्टी सीएम बृजेश पाठक के घर पर हो गई… और सबसे बड़ा सवाल – उस बैठक में खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मौजूद नहीं थे। क्या यह सिर्फ एक सामान्य संगठनात्मक बैठक थी? या फिर यूपी बीजेपी में बदलते शक्ति संतुलन का कोई बड़ा संकेत? क्या योगी मॉडल को बैलेंस करने की कोशिश हो रही है? या फिर मिशन 2027 से पहले पार्टी अंदरूनी समीकरण साध रही है? राजनीतिक सूत्र बताते हैं कि मार्च महीने में ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 6 बार RSS नेतृत्व के साथ समन्वय बैठक कर चुके हैं। 20 मार्च को सीएम आवास पर करीब साढ़े चार घंटे चली मैराथन बैठक में संघ ने मंत्रियों और विधायकों की कार्यशैली पर नाराजगी भी जताई थी। साफ कहा गया था कि संगठन और सरकार के बीच तालमेल की कमी का असर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ रहा है। लेकिन इसके तुरंत बाद डिप्टी सीएम बृजेश पाठक के आवास पर कोर कमेटी की बैठक होना… और उसमें संगठन के बड़े चेहरों की मौजूदगी… यह संकेत दे रहा है कि बीजेपी अब “सामूहिक नेतृत्व” का नया संदेश देना चाहती है या फिर अंदरूनी असंतुलन को साधने की कोशिश कर रही है। और यहीं से शुरू होता है असली सस्पेंस…एक तरफ योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। कानून व्यवस्था, बुलडोजर एक्शन और सख्त प्रशासन की वजह से उनकी छवि एक मजबूत प्रशासक की बनी है। देश के कई हिस्सों में योगी की सभाओं में उमड़ रही भीड़ ने उन्हें बीजेपी के सबसे बड़े हिंदुत्व चेहरों में शामिल कर दिया है। यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में एक और चर्चा जोर पकड़ रही है – क्या 2029 की राजनीति का बैकग्राउंड अभी से तैयार हो रहा है? क्या मोदी के बाद बीजेपी में अगली कतार के नेताओं की पोजिशनिंग शुरू हो चुकी है? और क्या इसी वजह से योगी आदित्यनाथ को लेकर पार्टी के भीतर अलग-अलग खेमों की सक्रियता बढ़ रही है? हालांकि दूसरी तरफ तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। RSS लगातार योगी सरकार के साथ खड़ा दिखाई देता है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी कई मौकों पर योगी की तारीफ कर चुके हैं और उन्हें देश का सबसे अच्छा मुख्यमंत्री बता चुके हैं। तो फिर सवाल और गहरा हो जाता है…जब संघ का समर्थन है, केंद्रीय नेतृत्व की खुली नाराजगी भी सामने नहीं है, तो फिर ये अलग-अलग जगहों पर हो रही बैठकों का संदेश क्या है? क्या यह सिर्फ चुनावी तैयारी है? या फिर बीजेपी यूपी में सत्ता को एक चेहरे से हटाकर टीम मॉडल की तरफ ले जाने का प्रयोग कर रही है?

बैठक में मिशन 2027 की तैयारियों पर भी बड़ा फोकस रहा। संगठनात्मक नियुक्तियों की डेडलाइन तय करने से लेकर निगम-आयोगों में राजनीतिक नियुक्तियों का रोडमैप, ओबीसी आयोग के गठन से लेकर पंचायत चुनाव की रणनीति तक – साफ है कि बीजेपी कोई भी ढिलाई नहीं छोड़ना चाहती। साथ ही संघ की तरफ से यह भी संदेश दिया गया कि नेताओं की बयानबाजी नियंत्रित हो और जातिगत राजनीति की बजाय राष्ट्रवाद के मुद्दे को फिर से केंद्र में लाया जाए। लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल अभी भी वही है…क्या यूपी बीजेपी में सब कुछ सामान्य है? या फिर अंदर ही अंदर 2027 से पहले की सबसे बड़ी रणनीतिक बिसात बिछाई जा रही है? क्या योगी को और मजबूत करने की तैयारी है? या फिर शक्ति संतुलन बनाने की सियासत चल रही है? फिलहाल इतना तय है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में जो दिख रहा है, कहानी सिर्फ उतनी ही नहीं है… असली कहानी उन बैठकों में छिपी है जिनके दरवाजे बंद हैं… और जिनके फैसले आने वाले समय में यूपी ही नहीं, देश की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं।






