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2026 खत्म होने से पहले गिर जाएगी मोदी सरकार?

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क्या 2026 से पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने पद से इस्तीफा दे सकते हैं? क्या अमित शाह और मोदी की जोड़ी का राजनीतिक दौर अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है? क्या बीजेपी के अंदर ही एक नई लीडरशिप उभरने वाली है जो 2026 के बाद पार्टी की दिशा बदल देगी? और क्या वाकई देश की सबसे मजबूत मानी जाने वाली मोदी-शाह की सरकार किसी बड़े सियासी भूचाल की तरफ बढ़ रही है? इन सवालों ने देश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।

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दरअसल ये चर्चाएं उस समय तेज हो गईं जब आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने एक बड़ा राजनीतिक दावा कर दिया। दिल्ली में शिवसेना (उद्धव गुट) के नेता संजय रावत की किताब के लॉन्च कार्यक्रम के दौरान केजरीवाल ने कहा कि उनका दिल और राजनीतिक अनुभव कहता है कि 2026 तक नरेंद्र मोदी और अमित शाह की राजनीतिक पारी खत्म हो सकती है और बीजेपी के अंदर से ही एक नए नेतृत्व का उदय हो सकता है। केजरीवाल ने यह भी दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता पहले के मुकाबले कम हुई है। उन्होंने कहा कि पहले सोशल मीडिया पर मोदी के खिलाफ आने वाले नकारात्मक कमेंट्स को जल्दी हटा दिया जाता था, लेकिन अब हालात बदल गए हैं और उनके पोस्ट पर बड़ी संख्या में आलोचनात्मक टिप्पणियां देखने को मिल रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अब पीएम मोदी को लेकर इतने मीम बन रहे हैं कि उन पर कार्रवाई करना भी संभव नहीं रह गया है। बीजेपी की चुनावी जीत पर सवाल उठाते हुए केजरीवाल ने आरोप लगाया कि चुनावों में गड़बड़ी हो रही है। उन्होंने कहा कि वोट जोड़ने और हटाने का खेल चलता है और फर्जी मतदान भी कराया जाता है। अपनी नई दिल्ली विधानसभा सीट का उदाहरण देते हुए उन्होंने दावा किया कि उनके वोट जानबूझकर कम किए गए।

केजरीवाल ने केंद्र सरकार को कई मुद्दों पर घेरते हुए कहा कि सरकार हर मोर्चे पर कमजोर नजर आ रही है। उन्होंने UGC से जुड़े मुद्दों, अंतरराष्ट्रीय तनाव, शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव, LPG की समस्या, रोजगार संकट और रुपये की कमजोरी जैसे मुद्दों का जिक्र करते हुए सवाल उठाया कि इन चुनौतियों से निपटने की बेहतर तैयारी क्यों नहीं की गई और हर बार इसका असर आम जनता पर ही क्यों पड़ता है। इस कार्यक्रम में लॉन्च हुई संजय रावत की किताब ने भी कई विवादित दावों के कारण राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है। किताब में दावा किया गया है कि 2001 के दौरान नरेंद्र मोदी को गिरफ्तार करने की तैयारी थी, लेकिन उस समय शरद पवार ने यह कहते हुए इसका विरोध किया कि जनता द्वारा चुने गए एक मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी उचित नहीं होगी।किताब में एक और दावा किया गया है कि एक मामले में अमित शाह को जमानत दिलाने में भी शरद पवार और शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे की भूमिका रही थी। इसके अलावा यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ संवैधानिक पदों से जुड़े फैसलों के पीछे भी राजनीतिक दबाव हो सकता है, हालांकि इन सभी दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। फिलहाल इन बयानों और दावों को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। बीजेपी या सरकार की तरफ से इन आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया आती है, इस पर भी सबकी नजरें टिकी हुई हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी भी वही है – क्या यह सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी है या फिर आने वाले समय में भारतीय राजनीति में सच में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है?

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