घोड़े… हाथी… रथ… और हाथों में फरसा लिए सैनिक! सुनने में यह किसी पौराणिक युद्ध की तैयारी लगती है, लेकिन यह दावा किया जा रहा है 21वीं सदी के भारत में, वो भी उत्तर प्रदेश की धरती से। एक तरफ फरसा वाले बाबा की संदिग्ध हालात में मौत होती है और दूसरी तरफ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद 2 लाख 18 हजार लोगों की चतुरंगिणी फरसा सेना बनाने का ऐलान कर देते हैं। इसके बाद सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। अब सवाल उठ रहे हैं — क्या यह सिर्फ धर्म की रक्षा के लिए बनाई जा रही सेना है? या फिर इसके पीछे कोई बड़ा सियासी संदेश छिपा है? क्या यह तैयारी 2027 के चुनाव से पहले किसी बड़े टकराव का संकेत है?
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दरअसल शंकराचार्य और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच पिछले कुछ समय से तल्खी खुलकर सामने आई है। कुंभ मेले के दौरान हुए एक विवाद के बाद दोनों के बीच बयानबाजी तेज हो गई थी। प्रशासन द्वारा शंकराचार्य से उनके पद का प्रमाण मांगे जाने पर उन्होंने इसे अपमान बताया था और खुलकर योगी सरकार पर निशाना साधा था। यहीं नहीं, शंकराचार्य ने यह तक कह दिया था कि योगी आदित्यनाथ को तय करना चाहिए कि वह मुख्यमंत्री रहेंगे या गोरखनाथ पीठ के महंत। उन्होंने योगी के हिंदू स्वरूप तक पर सवाल खड़े कर दिए थे। तभी से दोनों के बीच वैचारिक टकराव की चर्चा जारी है। ऐसे में अब जब शंकराचार्य इतनी बड़ी संख्या में एक “सेना” बनाने की बात कर रहे हैं तो राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह सिर्फ धार्मिक संगठन है या फिर योगी सरकार के खिलाफ शक्ति प्रदर्शन?अब जरा समझिए यह चतुरंगिणी सेना क्या है। प्राचीन भारत में राजाओं की सेना चार हिस्सों में होती थी — हाथी, रथ, घुड़सवार और पैदल सैनिक। इसी मॉडल को चतुरंगिणी सेना कहा जाता था। शंकराचार्य का कहना है कि उनकी सेना भी इसी अवधारणा से प्रेरित होगी। बताया जा रहा है कि इस सेना में देशभर से 2,18,000 लोग शामिल किए जाएंगे, जिनमें महिला, पुरुष और थर्ड जेंडर सभी होंगे। करीब 20 विभाग बनाए जाएंगे और अगले साल प्रयागराज में मौनी अमावस्या के दिन इसका औपचारिक शुभारंभ करने की योजना है। इस सेना का घोषित उद्देश्य गाय, ब्राह्मण और सनातन धर्म की रक्षा बताया गया है। सभी सदस्य पीले वस्त्र पहनेंगे और धार्मिक अनुशासन में रहेंगे। शंकराचार्य ने “रोको, टोको और ठोको” जैसा नारा भी दिया है, जिसने विवाद को और बढ़ा दिया है।अब कानूनी सवाल भी उठ रहा है — क्या भारत में कोई भी प्राइवेट सेना बना सकता है? कानून साफ कहता है कि हथियारबंद निजी सेना या मिलिशिया बनाना अवैध है। लेकिन अगर कोई संगठन सामाजिक या धार्मिक स्वयंसेवकों का समूह बनाता है और कानून के दायरे में काम करता है तो वह अलग श्रेणी में आता है। इसलिए यह देखना होगा कि यह संगठन किस रूप में काम करता है। अगर तुलना करें तो देश में कई संगठन अपने स्वयंसेवक नेटवर्क के साथ काम करते हैं। जैसे आरएसएस, भीम आर्मी, करणी सेना या अन्य सामाजिक संगठन। लेकिन ये खुद को सेना नहीं बल्कि संगठन या मंच बताते हैं। अब सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है क्या यह 2.18 लाख लोगों की “फरसा सेना” 2027 के चुनावों में कोई भूमिका निभाएगी?क्या यह सिर्फ सुरक्षा और धर्म रक्षा के लिए है? या फिर किसी को सत्ता से हटाने की बड़ी रणनीति का हिस्सा? फिलहाल इन सवालों का कोई सीधा जवाब नहीं है। लेकिन इतना जरूर है कि इस ऐलान ने एक नई बहस छेड़ दी है जहां धर्म, कानून और राजनीति तीनों आमने-सामने खड़े नजर आ रहे हैं। एक तरफ फरसा वाले बाबा की मौत…दूसरी तरफ फरसा सेना का ऐलान…और बीच में खड़े कई अनसुलझे सवाल। अब देखना होगा यह सेना सिर्फ धार्मिक प्रतीक बनकर रह जाती है…या फिर यूपी की सियासत में कोई नया अध्याय लिखती है।






