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देश में लगेगा लॉक डाउन ? युद्ध को लेकर दिल्ली में हुई सर्वदलीय बैठक! देश में मचा हड़कंप !

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देशवासियों…अपनी सीट की पेटी बांध लीजिए… क्योंकि दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां से आगे का रास्ता भी मुश्किल दिख रहा है और पीछे लौटना भी आसान नहीं है। क्या भारत एक नए ऊर्जा संकट की तरफ बढ़ रहा है? क्या भारत-रूस की दोस्ती अब पहले जैसी मजबूत नहीं रही? और क्या अमेरिका के बढ़ते दबाव का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है?ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि जमीनी तस्वीरें कुछ और ही कहानी बता रही हैं।

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एक तरफ सरकार कह रही है कि देश में पेट्रोल, डीजल, LPG और खाद्य आपूर्ति की कोई कमी नहीं है…लेकिन दूसरी तरफ… पेट्रोल पंपों पर लंबी लाइनें हैं
गैस एजेंसियों के बाहर भीड़ है और बड़े शहरों से मजदूरों का पलायन शुरू हो चुका है। सूरत… मुंबई… गुजरात… जैसे औद्योगिक शहरों से हजारों मजदूर अपने गांव लौट रहे हैं। सवाल है… अगर सब कुछ सामान्य है तो फिर यह डर क्यों? दरअसल एक्सपर्ट बताते हैं कि शहरों में रहने वाला गरीब मजदूर रोज कमाता है और रोज खाना खाता है। जब गैस महंगी हो जाए… जब सप्लाई चेन प्रभावित हो जाए… जब ब्लैक में मिलने वाली गैस बंद हो जाए…तो सबसे पहले असर उसकी रोटी पर पड़ता है। और जब रोटी का संकट आता है… तो इंसान शहर नहीं देखता… वह अपने गांव लौट जाता है। यही वजह है कि यह पलायन सिर्फ सामाजिक संकट नहीं… भारत की अर्थव्यवस्था के लिए भी खतरे की घंटी है। क्योंकि अगर मजदूर शहर छोड़ देंगे… तो फैक्ट्रियां कैसे चलेंगी? उद्योग कैसे चलेंगे? इसी बीच इस पूरे मुद्दे पर राजनीति भी तेज हो गई है। सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाई… जिसमें अमित शाह, राजनाथ सिंह, एस जयशंकर, निर्मला सीतारमण और हरदीप पुरी जैसे बड़े मंत्री शामिल हुए। वहीं विपक्ष की तरफ से कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, NCP और AIMIM के नेता मौजूद रहे। बैठक में सरकार ने कहा – भारत 40 से ज्यादा देशों से ऊर्जा सप्लाई सुनिश्चित कर रहा है और कोई संकट नहीं है। लेकिन विपक्ष ने सीधा सवाल पूछा –अगर संकट नहीं है तो लाइनें क्यों लग रही हैं? अगर सब ठीक है तो लोग डर क्यों रहे हैं? सूत्रों के मुताबिक विपक्ष सरकार के जवाब से संतुष्ट नहीं था और संसद में चर्चा की मांग की गई। इसी दौरान एक और मुद्दे पर माहौल गर्म हो गया जब पाकिस्तान की मध्यस्थता की बात उठी।बताया जाता है कि इस पर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कड़ा जवाब दिया और कहा –भारत कोई दलाल राष्ट्र नहीं है…यह बयान अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।लेकिन असली चिंता कहीं और है…और वह है भारत-रूस संबंध।एक समय था जब कहा जाता था – भारत और रूस का रिश्ता तन और कपड़े जैसा है। लेकिन अब खबर आ रही है कि रूस ने भारत को मिलने वाली रियायती दरें खत्म कर दी हैं। अब भारतीय कंपनियों को रूसी तेल ब्रेंट क्रूड से भी महंगे प्रीमियम पर मिल रहा है। यही नहीं… रूस ने एक महीने के लिए खाद का निर्यात भी रोक दिया है। और याद रखिए… रूस भारत का सबसे बड़ा खाद सप्लायर है। 2025 के सिर्फ 6 महीनों में रूस ने भारत को 25 लाख टन खाद दिया था। ऐसे में यह फैसला भारत की कृषि व्यवस्था पर भी असर डाल सकता है। दूसरी तरफ मिडिल ईस्ट में हालात और खराब हो रहे हैं। ईरान-इजरायल-अमेरिका तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य प्रभावित हुआ है। और दुनिया का लगभग 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है। अगर यहां संकट आता है… तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था हिल जाती है। और भारत भी इससे अछूता नहीं रह सकता। हालांकि सरकार का कहना है कि भारत की स्थिति मजबूत है और हम हर चुनौती से निपटने के लिए तैयार हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बयान भी वायरल हो रहा है जिसमें उन्होंने कहा – जिस तरह कोरोना संकट का सामना किया था… उसी तरह इस वैश्विक संकट का भी सामना करेंगे। लेकिन बड़ा सवाल अभी भी वही है…क्या सच में सब कुछ सामान्य है? या फिर जनता को पूरी सच्चाई नहीं बताई जा रही? क्या भारत-रूस की दोस्ती बदल रही है? क्या अमेरिका का दबाव असर दिखा रहा है? या यह सिर्फ एक अस्थायी वैश्विक संकट है? सच्चाई जो भी हो… लेकिन इतना तय है – अगर ऊर्जा सप्लाई प्रभावित होती है… तो सबसे ज्यादा असर आम आदमी पर ही पड़ेगा। और आज देश का आम नागरिक सिर्फ एक जवाब चाहता है –क्या हालात सच में नियंत्रण में हैं…या हमें एक और बड़े संकट के लिए तैयार रहना चाहिए? देश इंतजार कर रहा है… और जनता जानना चाहती है – सच्चाई क्या है।क्योंकि ईरान-इजरायल-अमेरिका तनाव का असर अब सिर्फ युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दुनिया के कई देश इसकी चपेट में आते नजर आ रहे हैं। श्रीलंका, बांग्लादेश, भूटान, पाकिस्तान, फिलीपींस, कंबोडिया, म्यांमार, मिस्र और न्यूजीलैंड जैसे देशों में हालात इतने बिगड़ गए हैं कि कई जगह लॉकडाउन जैसे हालात बन गए हैं। सड़कों पर सन्नाटा है, उद्योगों की रफ्तार धीमी पड़ गई है और बड़ी आबादी घरों से काम करने को मजबूर बताई जा रही है। वैश्विक सप्लाई चेन पर असर और बढ़ती अनिश्चितता ने इन देशों की अर्थव्यवस्था को भी दबाव में ला दिया है, जिससे पूरी दुनिया में चिंता का माहौल बनता जा रहा है।

इस वैश्विक तनाव के बीच एक और डरावनी आशंका भी सामने आ रही है…एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर ईरान-इजरायल-अमेरिका का टकराव नहीं रुका और युद्ध और बढ़ा, तो इसका असर सिर्फ तेल और अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा… बल्कि दुनिया के इंटरनेट सिस्टम तक पहुंच सकता है। बहुत कम लोग जानते हैं कि दुनिया का लगभग 80 से 90 प्रतिशत इंटरनेट डेटा समुद्र के अंदर बिछी फाइबर ऑप्टिक केबल्स के जरिए चलता है। यानी आप जो Facebook चलाते हैं…YouTube देखते हैं WhatsApp पर मैसेज करते हैं…या Google पर सर्च करते हैं…उसका बड़ा हिस्सा इन्हीं समुद्री केबल्स के सहारे चलता है। अगर युद्ध के दौरान इन समुद्री केबल्स को नुकसान पहुंचता है…या उन क्षेत्रों में सैन्य गतिविधियां बढ़ती हैं… तो अचानक इंटरनेट स्पीड गिर सकती है…मोबाइल नेटवर्क प्रभावित हो सकते हैं…कुछ ऐप्स अस्थायी रूप से बंद भी हो सकते हैं। हालांकि एक्सपर्ट यह भी कहते हैं कि दुनिया के पास बैकअप सिस्टम होते हैं इसलिए पूरी दुनिया का इंटरनेट एक साथ बंद होना बहुत दुर्लभ स्थिति होती है…लेकिन अगर बड़े स्तर पर साइबर या इंफ्रास्ट्रक्चर हमला होता है तो असर जरूर दिख सकता है।यानी साफ है… आज की दुनिया में युद्ध सिर्फ जमीन पर नहीं होता…अब जंग तेल की भी है…अर्थव्यवस्था की भी है…और इंटरनेट की भी है।

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