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BJP में बगावत? अपनी ही पार्टी के MLC ने सरकार और अधिकारियों पर उठाये बड़े सवाल |

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उत्तर प्रदेश की सत्ता के अंदर क्या सब कुछ ठीक चल रहा है या फिर बीजेपी के अंदर ही योगी आदित्यनाथ के खिलाफ बगावत की स्क्रिप्ट लिखी जा रही है? क्योंकि इस बार हमला विपक्ष ने नहीं बल्कि बीजेपी के ही एक बड़े क्षत्रिय चेहरे ने किया है और सीधे योगी के सबसे भरोसेमंद अफसर पर गंभीर आरोप लगा दिए हैं। सवाल बड़ा है… क्या योगी को घेरने की अंदरूनी साजिश चल रही है? क्या मुख्यमंत्री तक सच्चाई पहुंचने से रोकी जा रही है? और क्या दिल्ली की राजनीति का असर अब लखनऊ की कुर्सी तक दिखाई देने लगा है? एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह ने न सिर्फ फेक एनकाउंटर जैसे गंभीर आरोप लगाए बल्कि यह तक कह दिया कि यूपी में अधिकारी बेलगाम हो गए हैं और मुख्यमंत्री तक सही रिपोर्ट नहीं पहुंच रही। तो क्या यूपी की राजनीति में शुरू हो गया है पावर वॉर? क्या योगी की इमेज को नुकसान पहुंचाने की कोशिश हो रही है?

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आज हम आपको बताएंगे इस पूरे विवाद की अंदर की कहानी जो अभी तक आपसे छुपाई जा रही है। दरअसल पूरा मामला बीजेपी के एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह से जुड़ा है जो पिछले कुछ समय से लगातार अपनी ही सरकार के खिलाफ सवाल उठाते रहे हैं। लेकिन इस बार मामला ज्यादा गंभीर इसलिए माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने सीधे योगी आदित्यनाथ के करीबी और यूपी के सबसे ताकतवर अफसरों में गिने जाने वाले प्रमुख सचिव संजय प्रसाद पर निशाना साधा है। राजनीतिक गलियारों में संजय प्रसाद को योगी का दाहिना हाथ कहा जाता है। कई अहम विभाग उनके पास हैं और सरकार की नीतियों को लागू कराने में उनकी बड़ी भूमिका मानी जाती है। ऐसे में उनके ऊपर लगे आरोप सीधे सरकार की साख से जोड़कर देखे जा रहे हैं। देवेंद्र प्रताप सिंह का आरोप है कि उत्तर प्रदेश में कई एनकाउंटर संदिग्ध रहे हैं और प्रशासन की सही तस्वीर मुख्यमंत्री तक नहीं पहुंचाई जा रही है। उनका कहना है कि अधिकारी अपनी छवि बचाने के लिए जमीनी सच्चाई को दबा रहे हैं। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब देवेंद्र प्रताप सिंह ने अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा किया हो। जुलाई 2024 में जब योगी सरकार ने शिक्षकों की डिजिटल अटेंडेंस लागू करने का फैसला किया था तब भी उन्होंने खुलकर विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि शिक्षक मशीन नहीं हैं और सरकार को मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
इसके बाद उन्होंने उद्योग विभाग में भ्रष्ट नियुक्तियों का मुद्दा उठाया था और आरोप लगाया था कि कुछ दागी अधिकारियों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया गया है। 2026 में दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने यह भी कहा था कि अगड़े समाज में नाराजगी बढ़ रही है और सरकार को इस संकेत को गंभीरता से लेना चाहिए।

अब जो ताजा विवाद सामने आया है वह सुल्तानपुर की एक घटना से जुड़ा है। बताया जा रहा है कि 15 मार्च को एक संपत्ति विवाद के बाद पुलिस ने राणा अजीत प्रताप सिंह और उनके परिवार के कई सदस्यों को जेल भेज दिया। इस परिवार में एक रिटायर्ड PCS अधिकारी भी शामिल हैं। देवेंद्र प्रताप सिंह का आरोप है कि यह कार्रवाई निष्पक्ष नहीं थी बल्कि एक स्थानीय बीजेपी विधायक की साजिश का परिणाम थी। उन्होंने कहा कि सिर्फ 9 दिनों के अंदर 12 लोगों पर 25-25 हजार रुपए का इनाम घोषित कर दिया गया जो सामान्य मारपीट के मामले में बेहद असामान्य है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सुल्तानपुर के एसपी निष्पक्ष नहीं हैं और बड़े अधिकारियों के संरक्षण में पुलिस काम कर रही है। सबसे बड़ा और गंभीर आरोप उन्होंने यह लगाया कि पुलिस इन आरोपियों का एनकाउंटर करना चाहती है। उन्होंने कहा कि अगर इन लोगों को कुछ होता है तो उसकी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि योगी सरकार की कानून व्यवस्था की नीति अच्छी है लेकिन जमीनी स्तर पर अधिकारी उसे सही तरीके से लागू नहीं कर रहे। उनका कहना है कि आम जनता परेशान है और मुख्यमंत्री तक सही फीडबैक नहीं पहुंच पा रहा है। देवेंद्र प्रताप सिंह ने यह भी कहा कि जब सिस्टम से उम्मीद खत्म हो जाती है तब इंसान को कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ता है और इसी वजह से उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने कोर्ट को मेल भेजकर उन युवकों के जीवन की सुरक्षा की मांग की है जिन पर इनाम घोषित हुआ है। अब इस पूरे मामले को सिर्फ प्रशासनिक विवाद नहीं बल्कि राजनीतिक नजरिए से भी देखा जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी के अंदर क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरणों को लेकर भी खींचतान चल रही है। कुछ लोग इसे दिल्ली बनाम लखनऊ की पावर पॉलिटिक्स से जोड़कर भी देख रहे हैं। हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है लेकिन हाल की घटनाओं ने इन चर्चाओं को हवा जरूर दी है। हाल ही में जल जीवन मिशन को लेकर भी बीजेपी के ही विधायक ने मंत्री स्वतंत्र देव सिंह पर गंभीर आरोप लगाए थे। बाद में जब मामला दिल्ली पहुंचा तो कार्रवाई भी हुई और 26 अधिकारियों को सस्पेंड किया गया। इससे यह संदेश भी गया कि पार्टी के अंदर उठने वाली आवाजें सीधे शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच रही हैं। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या देवेंद्र प्रताप सिंह का मामला भी उसी तरह का दबाव बनाने की रणनीति है या फिर वाकई कोई गंभीर प्रशासनिक गड़बड़ी है? फिलहाल योगी सरकार की तरफ से इस पूरे मामले पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर पार्टी के अंदर से ही इस तरह के आरोप जारी रहे तो विपक्ष को सरकार को घेरने का मौका मिल सकता है। अब देखना यह होगा कि पार्टी नेतृत्व इस मामले को कैसे संभालता है और क्या देवेंद्र प्रताप सिंह की शिकायतों की जांच होती है या नहीं। सबसे बड़ा सवाल अभी भी वही है…क्या यह सिर्फ एक स्थानीय विवाद है? या फिर यूपी बीजेपी के अंदर चल रही बड़ी सियासी खींचतान का हिस्सा? क्या योगी की सख्त प्रशासनिक शैली से कुछ लोग असहज हैं? या फिर यह सब 2027 के चुनाव से पहले की पोजिशनिंग है? इन सभी सवालों के जवाब आने वाले समय में मिलेंगे लेकिन इतना जरूर है कि यूपी की राजनीति में यह विवाद अब चर्चा का बड़ा मुद्दा बन चुका है।

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