उत्तर प्रदेश कैडर के एक दलित IAS अधिकारी रिंकू सिंह राही ने पद से इस्तीफा दे दिया है उन्होंने आरोप लगाया कि उनके काबिलियत की अनदेखी की गयी है उन्हें वो पद नहीं दिया गया जिसके वो हक़दार थे ,,, एक ऐसा अधिकारी, जिसने गोलियां खाईं… घोटाले उजागर किए… ईमानदारी की कीमत चुकाई… लेकिन आखिरकार सिस्टम से ही हार मान ली।जैसे ही उनके इस्तीफे की खबर आई, वैसे ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में बयानबाजी का दौर शुरू हो गया।

भीम आर्मी प्रमुख और नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद रावण ने इसे सिर्फ एक इस्तीफा नहीं बल्कि व्यवस्था पर सवाल बताते हुए आरोप लगाया कि प्रदेश में दलित अधिकारियों के साथ भेदभाव हो रहा है।रिंकू सिंह राही की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है।अलीगढ़ के एक साधारण परिवार में जन्म… पिता की आटा चक्की… सरकारी स्कूल से पढ़ाई… छात्रवृत्ति के सहारे आगे बढ़ना… इंजीनियरिंग करना… और फिर 2008 में PCS पास कर प्रशासनिक सेवा में आना। लेकिन असली पहचान तब बनी जब उन्होंने करीब 100 करोड़ रुपये के घोटाले का पर्दाफाश किया। इसकी कीमत उन्हें जानलेवा हमले के रूप में चुकानी पड़ी। 2009 में उन पर हमला हुआ और उन्हें गोलियां लगीं। फिर भी वह नहीं रुके… लेकिन अब वह कहते हैं कि सिस्टम की बेरुखी ने उनका हौसला तोड़ दिया। अब उनका इस्तीफा सिर्फ एक कागजी प्रक्रिया नहीं रहा, बल्कि यह एक बड़ा सवाल बन गया है— क्या ईमानदार अधिकारियों के लिए सिस्टम में जगह कम होती जा रही है? क्या योग्यता से ज्यादा कुछ और तय करता है कि किसे जिम्मेदारी मिलेगी?रिंकू सिंह राही का इस्तीफा अब प्रशासनिक व्यवस्था, सामाजिक न्याय और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच एक बड़ी बहस का विषय बन चुका है।






