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BHU में ब्राह्मण छात्र का उत्पीड़न, BJP विधायक शलभमणि ने मुखर की आवाज, सपा पर करारा हमला!

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शलभमणि

वाराणसी स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय में सामने आई छात्र उत्पीड़न की घटना ने न केवल शैक्षणिक वातावरण पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि प्रदेश की राजनीति को भी एक बार फिर गरमा दिया है। हिंदी विभाग के एमए द्वितीय वर्ष के छात्र प्रशांत मिश्र के साथ कथित तौर पर क्लासरूम में हुई मारपीट की घटना को लेकर व्यापक आक्रोश देखा जा रहा है।

पीड़ित छात्र का आरोप है कि कुछ छात्रों ने पहले उनका नाम और जाति पूछी, और जैसे ही उन्होंने स्वयं को ब्राह्मण बताया, उनके साथ गाली-गलौज करते हुए मारपीट की गई। इस घटना ने समाज में जातीय तनाव और भेदभाव की जड़ें कितनी गहरी हैं, इस पर गंभीर बहस छेड़ दी है। विश्वविद्यालय परिसर में छात्रों के बीच रोष है और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग तेज हो गई है।

मामले ने राजनीतिक रंग तब लिया जब आरोप समाजवादी छात्र सभा से जुड़े छात्र नेता हिमांशु यादव पर लगे। पुलिस ने शिकायत के आधार पर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है और मामले की जांच जारी है। प्रशासन का कहना है कि दोषियों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा।

इसी बीच,देवरिया से BJP विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने इस घटना को लेकर समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोला है। विधायक ने बयान जारी कर कहा कि यह घटना “अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण, शर्मनाक और निंदनीय” है, और इससे समाजवादी पार्टी का “वास्तविक चरित्र” उजागर होता है। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसी घटनाओं के जरिए समाज में जातीय विद्वेष फैलाने की कोशिश की जा रही है।

विधायक ने आगे कहा कि प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी सरकार इस तरह की अराजकता को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेगी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में कानून-व्यवस्था को सख्ती से लागू किया जा रहा है। उन्होंने पुलिस अधिकारियों से वार्ता कर दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करने की बात भी कही।
यह घटना केवल एक छात्र के साथ हुई हिंसा का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह व्यापक सामाजिक चिंता का विषय बन चुकी है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या आज भी देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में जाति के आधार पर भेदभाव और हिंसा की गुंजाइश है? और क्या राजनीतिक दल इस संवेदनशील मुद्दे पर निष्पक्ष और जिम्मेदार भूमिका निभा रहे हैं?

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी जाति, वर्ग या समुदाय के खिलाफ हिंसा लोकतांत्रिक समाज के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। ऐसे मामलों में त्वरित और निष्पक्ष न्याय ही समाज में विश्वास बहाल कर सकता है। फिलहाल, सभी की निगाहें पुलिस जांच और प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं। लेकिन यह घटना एक गहरी सीख जरूर दे रही है शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले संस्थानों में भी यदि जातीय भेदभाव की घटनाएं सामने आती हैं, तो समाज को आत्ममंथन की सख्त जरूरत है।

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