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ओवैसी-कबीर की राहें जुदा, ममता को मिला मौका? बंगाल में ‘M फैक्टर’ का नया खेल! फंस गई बीजेपी

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पश्चिम बंगाल चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, वैसे-वैसे सियासत में नए मोड़ देखने को मिल रहे हैं। कभी साथ मिलकर ममता बनर्जी के लिए चुनौती बने हुमायूं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी अब अलग-अलग रास्तों पर हैं—और यही टूटन अब चुनावी गणित बदलती नजर आ रही है। हुमायूं कबीर, जो बाबरी मस्जिद वाले बयान से अचानक सुर्खियों में आए थे, टीएमसी से अलग होने के बाद अपनी पार्टी बनाकर ओवैसी के साथ मैदान में उतरे थे। दोनों की जोड़ी को मुस्लिम वोटों में सेंध लगाने वाली ताकत के तौर पर देखा जा रहा था, जिससे ममता बनर्जी की चिंता बढ़ गई थी। लेकिन एक वायरल वीडियो ने पूरा खेल ही पलट दिया। वीडियो में कबीर पर आरोप लगा कि वे बीजेपी से पैसे मांगकर ममता को हराने की रणनीति की बात कर रहे हैं। कबीर ने इसे AI जनरेटेड बताकर खारिज किया, लेकिन सियासी नुकसान हो चुका था। ओवैसी, जो पहले से ही बीजेपी से नजदीकी के आरोप झेलते रहे हैं, ने तुरंत दूरी बना ली और गठबंधन खत्म कर दिया। इस फैसले के पीछे साफ राजनीतिक गणित है। अगर ओवैसी कबीर के साथ रहते, तो विपक्ष को “बीजेपी की B-टीम” वाला नैरेटिव और मजबूत करने का मौका मिल जाता। ऐसे में AIMIM ने खुद को बचाने के लिए यह कदम उठाया। अब सवाल ये है कि इस टूट का फायदा किसे? जवाब सीधा ममता बनर्जी की ओर इशारा करता है। बंगाल में करीब 30% मुस्लिम वोटर हैं, जो सत्ता की चाबी माने जाते हैं। पहले डर था कि ये वोट AIMIM और कबीर के बीच बंट सकते हैं, लेकिन अब गठबंधन टूटने से यह खतरा काफी हद तक कम हो गया है। टीएमसी ने भी इस मौके को लपकते हुए ओवैसी और कबीर को बीजेपी की ‘B और C टीम’ बताना शुरू कर दिया है, जिससे मुस्लिम वोटरों में एकजुटता बढ़ सकती है। यानी, जो ‘M फैक्टर’ (मुस्लिम वोट) पहले बिखरता दिख रहा था, अब वही ममता के लिए “संजीवनी” बन सकता है। राजनीति में एक छोटी सी दरार कैसे पूरे चुनावी समीकरण बदल देती है—बंगाल इसका ताजा उदाहरण बनता दिख रहा है।

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