उत्तर प्रदेश की राजनीति इस वक्त सिर्फ गर्म नहीं, बल्कि विस्फोटक मोड़ पर खड़ी है। सत्ता और संगठन, दोनों भाजपा के भीतर आमने-सामने हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष व केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी के बीच तनातनी अब बंद कमरों से निकलकर सार्वजनिक मंचों तक पहुंच चुकी है। कटाक्ष, आरोप-प्रत्यारोप और शक्ति प्रदर्शनसब कुछ एक साथ चल रहा है। हालात ऐसे बन चुके हैं कि पार्टी के भीतर “एक बयान, दो तलवार” की स्थिति ज्यादा दिन टिकने वाली नहीं दिख रही।
लखनऊ से दिल्ली तक हलचल है, संगठन से सरकार तक खेमेबंदी साफ नजर आ रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी आमने-सामने हैं। मुद्दा सिर्फ सत्ता संतुलन का नहीं, बल्कि नियंत्रण का हैमंत्रिमंडल, संगठन, और SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) जैसे चुनावी तौर पर बेहद संवेदनशील मुद्दे पर जिम्मेदारी तय करने की जंग अब खुलकर सामने आ चुकी है। सवाल सिर्फ इतना हैउत्तर प्रदेश में असली ड्राइविंग सीट किसके हाथ में है? सूत्रों के मुताबिक, पंकज चौधरी की दखलअंदाजी सरकार के कामकाज में लगातार बढ़ रही है। मंत्रिमंडल में बड़े बदलाव की चर्चा जोरों पर है। कहा जा रहा है कि मौजूदा मंत्रियों में से करीब 70% की छुट्टी तय मानी जा रही है और उनकी जगह ऐसे चेहरों की एंट्री होगी जो संगठन, खासकर पंकज चौधरी और अमित शाह के बेहद करीबी माने जाते हैं।इतना ही नहीं, तीसरे डिप्टी सीएम की चर्चा भी तेज है। राजनीतिक गलियारों में इसे योगी आदित्यनाथ की ताकत पर अंकुश लगाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
यानी धीरे-धीरे लेकिन सुनियोजित तरीके से मुख्यमंत्री के अधिकार क्षेत्र को सीमित करने की कवायद के रूप में देखा जा रहा हैं ,। इसके आलावा असल टकराव का केंद्र SIR भी बन गया है मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पहले ही मतदाता सूची से करीब 3 करोड़ नाम कम होने के लिए संगठन की भूमिका पर सवाल उठा चुके हैं। और योगी का यही सवाल पंकज चौधरी को नागवार गुजरी और उसके बाद अब प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने पलटवार करते हुए सरेआम जिम्मेदारी सरकार पर डाल दी है ,,इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए पंकज चौधरी ने दो टूक कहा “ड्राइविंग सीट पर सरकार है।”हम नहीं ,,इस का साफ मतलब है ये सीएम योगी को जिम्मेदारी थी हमारी नहीं बता दे कि पंकज चौधरी ने यह बयान दिल्ली में गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात के तुरंत बाद दिया है , जिसने राजनीतिक संकेतों को और गहरा कर दिया। इसे सीधे तौर पर ‘टीम गुजरात बनाम टीम योगी’ की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है। पंकज चौधरी ने यह भी कहा कि पार्टी के जिन कार्यकर्ताओं को BLO-2 बनाया गया था, कई जगह उनकी लापरवाही और “दगाबाजी” सामने आई है।
उनके शब्दों में “ताली एक हाथ से नहीं बजती।”SIR को लेकर सरकार और संगठन ने जिस स्तर पर प्रचार किया था, जमीनी हालात उससे बिल्कुल अलग निकले। 27 दिसंबर से शुरू हुए अपने प्रदेश दौरे ब्रज क्षेत्र, पश्चिमी यूपी, गोरखपुर, काशी और अवध में पंकज चौधरी को जिलाध्यक्षों से जो फीडबैक मिला, उसमें सबसे बड़ी शिकायत रही कार्यकर्ताओं की उपेक्षा। खुद को संगठन की राजनीति में अपेक्षाकृत नया बताने वाले पंकज चौधरी लगातार एक संवाद दोहरा रहे हैं—“मैं कार्यकर्ताओं के लिए लड़ूंगा भी और अड़ूंगा भी।”लेकिन सवाल उठता है जब सरकार भी भाजपा की और संगठन भी, तो यह लड़ाई आखिर किससे? तो बता दे कि पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के दिन से ही यह चर्चा तेज हो गई थी कि यह ‘टीम गुजरात’ की ओर से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की घेराबंदी का हिस्सा है। गोरखपुर से जुड़े नेताओं को लगातार राष्ट्रीय और संवैधानिक पदों पर भेजे जाने को भी इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। पहले डॉ. राधामोहन दास अग्रवाल को राज्यसभा भेजा गया, फिर उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय महामंत्री बनाया गया।
इससे पहले शिव प्रताप शुक्ल को राज्यसभा, फिर केंद्रीय मंत्री और बाद में हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया। गोरखपुर की संगीता यादव को भी राज्यसभा भेजा गया। लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा को उत्तर प्रदेश में अप्रत्याशित झटका लगा। कई सीटों पर हार की एक बड़ी वजह मतदाता सूची की गड़बड़ियां बताई जा रही हैं। कई लोकसभा क्षेत्रों में पोलिंग पार्टियों की सूची में हजारों नामों के सामने ‘डिलीट’ लिखा था, जबकि पार्टी और प्रत्याशियों के पास मौजूद सूची में वही नाम शामिल थे। नतीजा—चुनावी रणनीति और मतदान प्रबंधन दोनों ध्वस्त। 11 जनवरी को चुनाव आयोग द्वारा लगाए गए विशेष शिविरों की जानकारी भी कई जगह संगठन तक नहीं पहुंची। कई बूथों पर भाजपा के BLA मौजूद नहीं थे, जिसको लेकर जिलाध्यक्षों ने औपचारिक शिकायतें दर्ज कराईं । इन सब के इतर सूत्रों की मानें तो RSS पूरी स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए है। संघ नहीं चाहता कि योगी आदित्यनाथ की छवि को कोई नुकसान पहुंचे।
RSS की नजर में योगी हिंदुओं के सबसे लोकप्रिय नेताओं में हैं और उनकी कार्यशैली राष्ट्र-धर्म को केंद्र में रखती है। यही वजह है कि संघ का झुकाव योगी के साथ साफ नजर आता है। वहीं दूसरी तरफ, दिल्ली पूरी तरह पंकज चौधरी के साथ खड़ी बताई जा रही है। कहा जा रहा है कि कार्यकर्ताओं की शिकायतों की पूरी चिट्ठी अमित शाह तक पहुंच चुकी है और बड़ा फैसला कभी भी लिया जा सकता है।यानिकि इस पूरी उथल पुथल पर एक तरीके से RSS और दिल्ली भी आमने सामने है ,, अब इस पूरी खबर का निष्कर्ष क्या है तो वो भी आप जान लीजिये ,,,लगातार मंत्रियों-विधायकों का पंकज चौधरी के घर जमावड़ा, शक्ति प्रदर्शन, बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप सब कुछ इशारा कर रहा है कि उत्तर प्रदेश भाजपा के भीतर बड़ा विस्फोट अब दूर नहीं। सवाल सिर्फ इतना है—क्या योगी आदित्यनाथ अपनी मजबूत राजनीतिक जमीन बचा पाएंगे, या फिर संगठन के नाम पर सत्ता की कमान धीरे-धीरे उनके हाथ से खिसकाई जाएगी? उत्तर प्रदेश की राजनीति के अगले कुछ हफ्ते सिर्फ सरकार नहीं, बल्कि भाजपा के भविष्य की दिशा भी तय करने वाले हैं।





