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योगी का ऐलान !विरोधियों की उड़ी नींद ! यूपी से दिल्ली तक मचा सियासी बवाल

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देश की राजनीति इस वक्त किसी सामान्य उथल-पुथल के दौर में नहीं है। यह वह क्षण है जब सड़कों पर उबलता गुस्सा और सत्ता के गलियारों में रची जा रही रणनीति आमने-सामने खड़ी दिखाई दे रही है। UGC के बहाने शुरू हुआ विरोध अब शिक्षा नीति का मसला भर नहीं रह गया, बल्कि यह उत्तर प्रदेश की सत्ता, योगी आदित्यनाथ की राजनीति और 2029 के नेतृत्व की लड़ाई का प्रवेश द्वार बन चुका है। इसी उथल-पुथल के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का गुजरात के गांधीनगर से दिया गया बयान अचानक राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है।

कहा जा रहा कि किसी ने अपने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि यूपी की राजनीति इतनी तेजी से बदल जायेगी ,,जी हां योगी भी नहीं सोचे होंगे कि उन्हीं के नेता उन्ही पर हमलावर हो सकते है। ..स्वामीनारायण संप्रदाय के कार्यक्रम में अमित शाह ने सनातन धर्म और उसकी परंपराओं को लेकर जो कहा, उसे कोई साधारण धार्मिक वक्तव्य मानने को तैयार नहीं है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जो सरकार सनातन धर्म के अनुयायियों को निराश करती है, वह देश में दोबारा सत्ता में नहीं लौट सकती। सवाल यह नहीं है कि यह बात किस मंच से कही गई, सवाल यह है कि यह बात किस समय कही गई। जब उत्तर प्रदेश में अविमुक्तेस्वर नन्द माघ मेले से बिना स्नान किये गुस्से में वापस लौट जाते है योगी साधु संत विरोधी बताते है ,,,दूसरी तरफ ब्राह्मण, क्षत्रिय और सामान्य वर्ग UGC को लेकर सड़कों पर हैं, जब योगी आदित्यनाथ को चारों तरफ से घेरने की कोशिशें तेज हैं, ठीक उसी समय यह बयान आना अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक संकेत माना जा रहा है।

राजनीतिक गलियारों में इसे योगी से जोड़कर देखा जा रहा है, और यह माना जा रहा है कि दिल्ली की ओर से यह एक तरह की चेतावनी है, नाम लिए बिना निशाना साधने की कोशिश। UGC को लेकर पैदा हुई नाराजगी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि यह कानून केंद्र सरकार का है, लेकिन पूरा राजनीतिक और सामाजिक दबाव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर बनाया जा रहा है। सवाल उठता है कि अगर फैसला दिल्ली का है तो निशाना लखनऊ क्यों? इसी सवाल से वह धारणा जन्म लेती है कि यह सब महज संयोग नहीं है, बल्कि योगी को राजनीतिक रूप से कमजोर करने की एक सुनियोजित कवायद है। धीरे-धीरे एक ऐसा नैरेटिव खड़ा किया जा रहा है जिसमें हर विरोध, हर असंतोष और हर इस्तीफे की जिम्मेदारी योगी पर डाली जाए, ताकि आने वाले चुनावों में सारा दोष उन्हीं के सिर मढ़ा जा सके। इस पूरे घटनाक्रम को 1990 के मंडल आंदोलन से जोड़कर देखा जा रहा है, जब आरक्षण के फैसले ने देश को हिला दिया था और अंततः बीपी सिंह की सत्ता चली गई थी। आज 36 साल बाद वही सामान्य वर्ग फिर सड़कों पर है, लेकिन इस बार विरोध की दिशा और भी चौंकाने वाली है। जिस वर्ग को मोदी-शाह की राजनीति का सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता था, वही वर्ग आज खुलकर नारेबाजी कर रहा है। यह भारतीय राजनीति के लिए असाधारण स्थिति है और शायद इसी कारण दिल्ली में बैठे रणनीतिकार सबसे ज्यादा सतर्क और बेचैन नजर आ रहे हैं। इसी बेचैनी के बीच अविमुक्तेश्वरानंद महाराज का माघ मेले से बिना स्नान लौटना और योगी के खिलाफ तीखे तेवर दिखाना भी अचानक बड़े राजनीतिक संदर्भ में फिट होने लगता है। जब योगी के खिलाफ बयानबाजी हो रही थी और उसी समय उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का संत के चरणों में झुकना कैमरों में कैद हुआ, तब से यह चर्चा और तेज हो गई कि कहीं यह सब दिल्ली के इशारों पर तो नहीं हो रहा।

राजनीतिक सूत्र दावा करते हैं कि योगी के खिलाफ एक ऐसा माहौल तैयार किया जा रहा है जिसमें धार्मिक, सामाजिक और प्रशासनिक हर मोर्चे से दबाव बनाया जाए। भाजपा के भीतर UGC को लेकर दिखाई दे रही खामोशी भी इस साजिशी तस्वीर को और गहरा करती है। राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और देवेंद्र फडणवीस जैसे बड़े चेहरे अब तक इस मुद्दे पर खुलकर सामने नहीं आए हैं। इसके उलट विपक्षी दलों के नेता खुलकर सामान्य वर्ग के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। यह चुप्पी उस नाराजगी को और बढ़ा रही है, जो धीरे-धीरे भाजपा के पारंपरिक सामाजिक आधार में दरार पैदा कर रही है। उत्तर प्रदेश में संगठन और सरकार के बीच बढ़ता टकराव भी इसी बड़े खेल का हिस्सा माना जा रहा है। प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर योगी की असहमति, दिल्ली हाईकमान की जिद और उसके बाद लगातार सरकारी फैसलों में हस्तक्षेप—इन सबने यह संदेश दिया है कि योगी को अब स्वतंत्र निर्णय लेने की पूरी छूट नहीं दी जा रही। यह सब ऐसे समय हो रहा है जब 2027 के विधानसभा चुनाव और उससे भी ज्यादा 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी चल रही है।

एक सर्वे में मोदी के बाद प्रधानमंत्री पद के संभावित दावेदारों में योगी आदित्यनाथ का नाम लगभग अमित शाह के बराबर आना ही शायद इस पूरी कहानी की जड़ है। माना जा रहा है कि यही बढ़ती लोकप्रियता योगी के खिलाफ सबसे बड़ा कारण बन गई है। भारतीय राजनीति का इतिहास गवाह है कि जब कोई नेता केंद्रीय नेतृत्व की छाया से बाहर निकलकर अपनी अलग पहचान बनाने लगता है, तो उसके खिलाफ अंदरूनी साजिशें तेज हो जाती हैं। आज उत्तर प्रदेश की सड़कों पर उठ रहे नारे इस बात का संकेत हैं कि जनता धीरे-धीरे इस खेल को समझने लगी है। “योगी तुझसे बैर नहीं” जैसे नारे सिर्फ समर्थन नहीं, बल्कि उस नैरेटिव को खारिज करने की कोशिश हैं जिसे दिल्ली से गढ़ा जा रहा है। सवाल अब सिर्फ UGC का नहीं रह गया है। असली सवाल यह है कि क्या योगी आदित्यनाथ को दिल्ली की राजनीति के जरिए कमजोर किया जाएगा, या फिर यह घेराबंदी उन्हें और मजबूत बनाकर सामने लाएगी।इतिहास एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। इस बार फैसला फाइलों में नहीं, सड़कों पर लिखा जा रहा है। और जब सड़कें बोलती हैं, तो सत्ता को जवाब देना ही पड़ता है।

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