Home Political news आंबेडकर जयंती पर पार्टियों में छिड़ी सम्मान की बहस ! मचा बवाल

आंबेडकर जयंती पर पार्टियों में छिड़ी सम्मान की बहस ! मचा बवाल

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“क्या उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब पूरा गेम बदल गया है,,,क्या बीजेपी अब ‘राम’ से ज्यादा ‘अंबेडकर’ के नाम पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है? और सबसे बड़ा सवाल—क्या ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज के महापुरुषों को साइडलाइन किया जा रहा है? या ये सब 2027 के चुनाव का सबसे बड़ा सियासी दांव है?
आज हम आपको बताएंगे वो पूरी कहानी… जो सिर्फ खबर नहीं, बल्कि आने वाले चुनाव का ट्रेलर है!” उत्तर प्रदेश की राजनीति इस वक्त जिस करवट बैठ रही है, उसने एक नई बहस छेड़ दी है। बहस ये कि क्या बीजेपी अब अपने पारंपरिक वोट बैंक से ज्यादा दलित वोट बैंक पर फोकस कर रही है?एक तरफ अंबेडकर जयंती को लेकर बड़े-बड़े ऐलान…सरकारी छुट्टी…4000 से ज्यादा मूर्तियों का निर्माण…उन पर छत्र लगाने के लिए सैकड़ों करोड़ का बजट…तो वहीं दूसरी तरफ परशुराम जयंती पर छुट्टी रद्द कर दी जाती है। सरकार का तर्क—कामकाज प्रभावित नहीं होना चाहिए।लेकिन सवाल उठता है—क्या ये सिर्फ प्रशासनिक फैसला है, या इसके पीछे सियासी मैसेज छिपा है? यही वजह है कि अब ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज के कई नेता खुलकर सामने आ रहे हैं। उनका कहना है—“सम्मान सभी महापुरुषों का होना चाहिए…लेकिन अगर एक को बढ़ा-चढ़ाकर और दूसरे को नजरअंदाज किया जाएगा,तो ये संतुलन बिगड़ेगा… और सियासत भी।

”दरअसल, 2027 का चुनाव नजदीक है…और दलित वोट बैंक यूपी की राजनीति में गेम चेंजर माना जाता है। इसी को देखते हुए बीजेपी ने एक बड़ा प्लान तैयार किया है—“गांव चलो, बस्ती चलो” अभियान। 12 अप्रैल से शुरू होने वाले इस अभियान में बीजेपी कार्यकर्ता दलित बस्तियों में जाएंगे…रात्रि विश्राम करेंगे…और सामाजिक समरसता का संदेश देंगे। यानी साफ है—बीजेपी जमीनी स्तर पर पकड़ मजबूत करने में जुटी है। इतना ही नहीं…14 अप्रैल को खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहारनपुर पहुंच रहे हैं।आधिकारिक तौर पर ये दौरा एक्सप्रेसवे के उद्घाटन के लिए है…लेकिन सियासी गलियारों में इसे दलित आउटरीच के तौर पर देखा जा रहा है।

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अब सवाल उठता है—क्या ये सिर्फ विकास है… या वोट बैंक की रणनीति? दूसरी तरफ विपक्ष भी पीछे नहीं है। अखिलेश यादव ने हर बूथ पर अंबेडकर जयंती मनाने का ऐलान कर दिया है। कांग्रेस भी 75 जिलों में कार्यक्रम कर रही है। और चंद्रशेखर आजाद से लेकर मायावती तक—हर कोई दलित वोट को साधने में लगा है। यानी अंबेडकर जयंती अब सिर्फ एक श्रद्धांजलि नहीं…बल्कि एक बड़ा सियासी मंच बन चुकी है। लेकिन इस पूरे मामले में एक और बड़ा सवाल उठ रहा है—क्या बाबा साहेब के पूरे विचार जनता तक पहुंचाए जाएंगे… या सिर्फ चुनिंदा बातें? क्योंकि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन में कई ऐसे विचार भी रखे, जो धार्मिक परंपराओं से टकराते हैं।उनकी 22 प्रतिज्ञाएं…और “Riddles in Hinduism” जैसे ग्रंथ…आज भी बहस का विषय हैं। क्या बाबा साहेब के पूरे विचार जनता तक पहुंचाए जा रहे हैं…या सिर्फ वही हिस्सा दिखाया जा रहा है, जो सियासत के लिए फायदेमंद है? डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 1956 में बौद्ध धर्म अपनाते समय 22 प्रतिज्ञाएं ली थीं—जो आज भी बेहद चर्चा में रहती हैं। इनमें कुछ प्रमुख प्रतिज्ञाएं इस प्रकार हैं,,“मैं ब्रह्मा, विष्णु, महेश को ईश्वर नहीं मानूंगा।” “मैं राम और कृष्ण को भगवान नहीं मानूंगा और उनकी पूजा नहीं करूंगा।” “मैं किसी भी हिंदू देवी-देवता की पूजा नहीं करूंगा।” “मैं यह नहीं मानूंगा कि भगवान ने कभी अवतार लिया है।” “मैं श्राद्ध और पिंडदान जैसे कर्मकांडों में विश्वास नहीं रखूंगा।” “मैं ब्राह्मणों द्वारा कराए जाने वाले किसी भी कर्मकांड को स्वीकार नहीं करूंगा।”और अंत में— “मैं बुद्ध के मार्ग का अनुसरण करूंगा और समानता, तर्क और मानवता को अपनाऊंगा।”अब सवाल यही है—जब राजनीतिक दल बाबा साहेब के नाम पर कार्यक्रम कर रहे हैं…तो क्या इन प्रतिज्ञाओं और विचारों को भी उतनी ही प्रमुखता से बताया जाएगा? या फिर इन हिस्सों को नजरअंदाज किया जाएगा क्योंकि ये एक बड़े वर्ग की धार्मिक भावनाओं से टकरा सकते हैं? अब आते हैं सबसे अहम पॉइंट पर—क्या इससे बीजेपी को नुकसान हो सकता है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यूपी में करीब 100 सीटों पर ब्राह्मण प्रभाव है…और 50-70 सीटों पर क्षत्रिय और सामान्य वर्ग का दबदबा। अगर ये वर्ग नाराज होता है…तो इसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है। लेकिन दूसरी तरफ सच्चाई ये भी है कि दलित वोट बैंक को नजरअंदाज करना किसी भी पार्टी के लिए आसान नहीं। यानी बीजेपी एक संतुलन साधने की कोशिश में है—जहां एक तरफ पारंपरिक वोट बैंक भी बना रहे…और दूसरी तरफ नए वोट भी जुड़ें।“तो क्या यूपी की राजनीति अब ‘जाति संतुलन’ का नया खेल बन चुकी है?क्या अंबेडकर बनाम परशुराम की ये बहस 2027 का सबसे बड़ा मुद्दा बनेगी? या फिर ये सब सिर्फ चुनावी शोर है, जो वक्त के साथ शांत हो जाएगा? आप क्या सोचते हैं—क्या ये सम्मान की राजनीति है… या वोट बैंक की रणनीति? कमेंट में जरूर बताइए… क्योंकि यूपी की राजनीति अब हर वोट की कहानी लिख रही है!”

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