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योगी ने भरे मंच से हिन्दुओं का नाम लेकर दुश्मनों ललकारा! गुस्सा देखकर विरोधियों में मची खलबली!

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उत्तर प्रदेश की सियासत में अब सिर्फ बयान नहीं, सीधा टकराव शुरू हो चुका है। मंच वही था, भीड़ वही थी, लेकिन अंदाज़ बिल्कुल बदला हुआ था। पहली बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गुस्सा इस तरह फूटा कि सियासी गलियारों में हलचल मच गई। महापुरुषों को जातियों में बांटने वालों को चेतावनी, सनातन को कमजोर करने वालों को खुली चुनौती—योगी के इस तेवर ने साफ कर दिया कि 2027 से पहले नैरेटिव की जंग तेज हो चुकी है। योगी आदित्यनाथ ने मंच से साफ शब्दों में कहा कि महापुरुषों को जाति में बांटना बंद करना होगा, यह सनातन को कमजोर करने की साजिश है और वह इसे किसी भी कीमत पर सफल नहीं होने देंगे। उन्होंने महाराणा प्रताप, महाराणा सांगा और महाराजा सूरजमल का उदाहरण देते हुए कहा कि इनका बलिदान किसी एक जाति के लिए नहीं बल्कि पूरे देश और सनातन धर्म के लिए था। योगी ने सीना ठोककर कहा कि महापुरुष हमारे नायक हैं, महानायक हैं और उन्हें जातियों में नहीं बांटा जा सकता। मोदी जी के नेतृत्व में आज देश और सनातन धर्म मजबूत हो रहा है ,, इसी बीच सियासी हलचल और तेज हो गई है क्योंकि खबर है कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह लखनऊ पहुंच रहे हैं, जहां उनकी मुलाकात योगी आदित्यनाथ से होगी।

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माना जा रहा है कि 2027 के चुनाव को लेकर बड़ा मंथन होगा, कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें होंगी और कोई बड़ी रणनीति भी सामने आ सकती है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि राजनाथ सिंह, योगी के समर्थन में कोई अहम प्लान तैयार कर सकते हैं, क्योंकि वह पहले भी योगी की तारीफ करते हुए उन्हें एक मजबूत और लोकप्रिय नेता बता चुके हैं। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर योगी आदित्यनाथ का इशारा किसकी तरफ था। कौन है जो हिंदू धर्म और सनातन को बांटने का काम कर रहा है? राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो देश में इस वक्त एक नया ट्रेंड तेजी से उभर रहा है, जिसमें महापुरुषों की जातीय पहचान को उभारकर उन्हें अलग-अलग खांचों में बांटा जा रहा है। अंबेडकर को दलित पहचान तक सीमित करने की कोशिश हो रही है, परशुराम को ब्राह्मणों का प्रतीक बताया जा रहा है, महाराणा प्रताप को क्षत्रिय गौरव तक सीमित किया जा रहा है। यानी इतिहास और विरासत को अब राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बनाया जा रहा है। इसी बहस के बीच यूजीसी कानून को लेकर भी एक बड़ा एंगल सामने आ रहा है। कुछ राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि जब से यूजीसी से जुड़े बदलाव सामने आए हैं, तब से समाज में असंतोष बढ़ा है। सामान्य वर्ग में नाराजगी देखने को मिली, कई जगहों पर विरोध और आंदोलन भी हुए। लोग सड़कों पर उतरे और अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंता जताई। वहीं दूसरी तरफ इस कानून के समर्थन में भी लोग सामने आए और उन्होंने कहा कि वर्षों से भेदभाव झेलने वाले वर्गों के लिए यह जरूरी कदम है। इस टकराव ने समाज में “हम बनाम वो” की लाइन को और गहरा कर दिया। सोशल मीडिया ने इस पूरी बहस को और तेज कर दिया। जहां पहले इस तरह की चर्चाएं सीमित दायरे में होती थीं, अब हर प्लेटफॉर्म पर यह सवाल उठने लगा कि कौन किसका महापुरुष है। किसकी विरासत पर किसका अधिकार है। देखते ही देखते महापुरुषों का सम्मान सियासी हथियार में बदल गया और समाज के भीतर एक नई तरह की बहस खड़ी हो गई। हालांकि तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं है। लाखन पासी, बिजली पासी और महाराजा सुहेलदेव जैसे महापुरुषों को हर वर्ग से सम्मान भी मिला है। कई लोगों ने खुलकर कहा कि जो भी महापुरुष सनातन धर्म और देश के लिए लड़े, उनका सम्मान सभी को करना चाहिए। लेकिन इसके बावजूद समग्र माहौल में यह साफ दिख रहा है कि जातीय पहचान की राजनीति पहले से ज्यादा तेज हो गई है। अब इस पूरे घटनाक्रम को 2027 के चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। अखिलेश यादव का PDA फॉर्मूला, चंद्रशेखर आजाद की आक्रामक दलित राजनीति और बीजेपी का “सनातन एकता” का नैरेटिव—ये तीनों मिलकर एक बड़ा सियासी संघर्ष तैयार कर रहे हैं। एक तरफ जातीय गोलबंदी है, तो दूसरी तरफ धार्मिक एकजुटता की कोशिश। और इसी टकराव के बीच योगी आदित्यनाथ का यह बयान सामने आया है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि योगी के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर भी लोगों की तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई लोगों ने लिखा कि हिंदू समाज को बांटने की कोशिश हो रही है और इसे रोकना जरूरी है। यानी सवाल सिर्फ विपक्ष पर नहीं उठ रहे, बल्कि बहस का दायरा और भी बड़ा हो गया है। राजनीतिक सूत्र तो यहां तक कह रहे हैं कि योगी आदित्यनाथ के बढ़ते प्रभाव को कम करने की कोशिशें भी दिल्ली से लगातार चल रही हैं। उनकी छवि एक ऐसे नेता की बन चुकी है जो हिंदुत्व और सनातन की एकजुटता की बात करता है, और यही वजह है कि उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। लेकिन इसी के साथ यह भी कहा जा रहा है कि अगर समाज में बंटवारा बढ़ा, तो इसका असर सीधे चुनावी नतीजों पर पड़ेगा। और जिसका फ़ायदा सीधा योगी के विरोधियों को मिलेगा ,,,इसलिए योगी सतर्क है और अपने विरोधियों की हर एक चाल का जवाब तैयार कर लिये है ,,,यही कारण है कि योगी आदित्यनाथ बार-बार एक ही बात दोहराते नजर आ रहे हैं कि अगर समाज बंटा तो कमजोर होगा। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 2027 का चुनाव किस दिशा में जाएगा। क्या यह विकास के मुद्दों पर लड़ा जाएगा या फिर जाति और धर्म के इस टकराव में पूरा नैरेटिव बदल जाएगा। और सबसे अहम बात, क्या महापुरुषों की विरासत अब सियासत का सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है।

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