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21 अप्रैल 1979: जब आरक्षण की राजनीति ने बदल दी बिहार की सत्ता

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बिहार की राजनीति के इतिहास में 21 अप्रैल की तारीख एक बड़े सियासी उलटफेर के रूप में दर्ज है। आज से ठीक 47 साल पहले, 21 अप्रैल 1979 को ‘जननायक’ कर्पूरी ठाकुर की सरकार गिर गई थी, उस समय वे मुख्यमंत्री के रूप में अपना दूसरा कार्यकाल संभाल रहे थे हालांकि, कर्पूरी ठाकुर 1 साल 301 दिन तक सत्ता में रहने के बाद पद से बाहर हो गए, दिलचस्प बात यह है कि वे अपने पहले कार्यकाल की तरह दूसरी बार भी मुख्यमंत्री के तौर पर 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सके, जिस सामाजिक न्याय और आरक्षण की लड़ाई ने उन्हें ‘जननायक’ बनाया, वही अंततः उनकी सरकार गिरने का कारण भी बनी।

मुंगेरीलाल आयोग और 26% आरक्षण का फैसला

मुख्यमंत्री रहते हुए कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़ी जातियों के हित में एक ऐतिहासिक कदम उठाया, उन्होंने मुंगेरीलाल आयोग की सिफारिशों के आधार पर सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 26 प्रतिशत आरक्षण लागू किया, उस दौर में यह फैसला बेहद क्रांतिकारी माना गया, लेकिन इसने तत्कालीन जनता पार्टी के भीतर ही विरोध की लहर पैदा कर दी।

गठबंधन के भीतर बढ़ा विरोध

1977 में सत्ता संभालने के बाद से ही कर्पूरी ठाकुर की नीतियों का विरोध गठबंधन के भीतर मौजूद सवर्ण नेताओं द्वारा किया जा रहा था, उन्हें आशंका थी कि आरक्षण की नीति उनके सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव को कमजोर कर देगी, इस विरोध ने धीरे-धीरे सरकार के भीतर गुटबाजी को जन्म दिया, जो समय के साथ और गहराती चली गई, हालात ऐसे बन गए कि मुख्यमंत्री को हटाने की रणनीति बनने लगी।

फ्लोर टेस्ट और सत्ता से विदाई

अप्रैल 1979 तक राजनीतिक खींचतान अपने चरम पर पहुंच गई,आरक्षण विरोधी गुटों और जनसंघ से जुड़े नेताओं के एकजुट होने के कारण कर्पूरी ठाकुर ने बहुमत खो दिया, 21 अप्रैल 1979 को हुए फ्लोर टेस्ट में वे विश्वास मत हासिल नहीं कर सके और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

नए मुख्यमंत्री बने राम सुंदर दास

कर्पूरी ठाकुर के इस्तीफे के बाद दलित नेता राम सुंदर दास को बिहार का नया मुख्यमंत्री बनाया गया, माना जाता है कि उन्हें इसलिए चुना गया ताकि राजनीतिक टकराव कम हो सके और आरक्षण नीतियों को लेकर संतुलन बनाया जा सके।

निष्कर्ष

21 अप्रैल 1979 सिर्फ एक सरकार के गिरने की कहानी नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, आरक्षण और सत्ता के बीच टकराव का प्रतीक भी है, कर्पूरी ठाकुर का यह फैसला भारतीय राजनीति में सामाजिक बदलाव की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुआ भले ही इसकी कीमत उन्हें अपनी सरकार गंवाकर चुकानी पड़ी।

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