उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। समाजवादी पार्टी (सपा) में संभावित टूट को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बयानबाजी का दौर शुरू हो गया है। सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर के दावे के बाद अब प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बयान ने इस मुद्दे को और गर्मा दिया है।
केशव प्रसाद मौर्य ने दावा किया है कि समाजवादी पार्टी के करीब 26 विधायक दल-बदल के लिए तैयार हैं। उनका कहना है कि भारतीय जनता पार्टी किसी भी विधायक को तोड़ने की कोशिश नहीं कर रही है, लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही कई नेता खुद ही सपा छोड़ने का फैसला कर सकते हैं।
इससे पहले सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर भी दावा कर चुके हैं कि समाजवादी पार्टी के कई नेता भाजपा में शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं। राजभर के इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया था।
उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य ने अपने बयान में यह भी कहा कि समाजवादी पार्टी अब पूरी तरह अखिलेश यादव के नियंत्रण में नहीं रह गई है और पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ रहा है। हालांकि, उन्होंने किसी विधायक का नाम सार्वजनिक नहीं किया।
वहीं समाजवादी पार्टी ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पलटवार करते हुए कहा कि उनकी पार्टी पूरी तरह एकजुट और मजबूत है। उन्होंने भाजपा पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि दूसरी पार्टियों में सेंध लगाना और राजनीतिक दलों को कमजोर करना भाजपा की पुरानी रणनीति रही है।
अखिलेश यादव ने कहा कि जो लोग समाजवादी पार्टी में टूट की बात कर रहे हैं, उन्हें पहले अपने संगठन की स्थिति पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि सपा के सभी विधायक और कार्यकर्ता मजबूती के साथ पार्टी के साथ खड़े हैं।
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव ने भी भाजपा के दावों को राजनीतिक बयानबाजी करार दिया। उन्होंने कहा कि भाजपा नेताओं को अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती हुई दिखाई दे रही है, इसलिए वे इस तरह के बयान देकर भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय ने भी स्पष्ट शब्दों में कहा कि समाजवादी पार्टी का एक भी विधायक भाजपा में शामिल नहीं होगा। उन्होंने विश्वास जताया कि 2027 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी मजबूत प्रदर्शन करेगी।
फिलहाल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है। एक ओर भाजपा और उसके सहयोगी दल सपा में असंतोष और संभावित टूट का दावा कर रहे हैं, तो दूसरी ओर समाजवादी पार्टी इन सभी दावों को निराधार बता रही है।
अब सबकी नजर आने वाले महीनों की राजनीतिक गतिविधियों पर टिकी है। क्या वास्तव में समाजवादी पार्टी के भीतर कोई बड़ा बदलाव होने वाला है या यह सिर्फ चुनावी रणनीति और राजनीतिक दबाव बनाने का प्रयास है, इसका जवाब समय के साथ ही सामने आएगा। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐसे कई घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं, जो राज्य के सियासी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं।






