Home Political news पंकज चौधरी की नई टीम में राजनाथ सिंह के बेटे समेत 9...

पंकज चौधरी की नई टीम में राजनाथ सिंह के बेटे समेत 9 राजपूत, 11 ब्राह्मण नेता शामिल

41
0

आखिरकार मोदी शाह और पंकज को ब्राह्मणों और राजपूतों की नाराजगी का डर सताने लगा है? क्या दिल्ली को यह एहसास हो गया है कि अगर सवर्ण वोटर छिटक गया तो 2027 की राह मुश्किल हो सकती है? और क्या इसी वजह से पंकज चौधरी की नई टीम में सबसे ज्यादा ब्राह्मणों और क्षत्रिय नेताओं का दब दबा दिखाई दे रहा है , जी हां उत्तर प्रदेश बीजेपी की नई कार्यकारिणी के ऐलान के बाद यही सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। राजनीतिक गलियारों में तो यहां तक कहा जा रहा है कि यह सिर्फ पंकज चौधरी की टीम नहीं, बल्कि योगी आदित्यनाथ की पसंद और दिल्ली की मजबूरी का मिला-जुला राजनीतिक फार्मूला है। उत्तर प्रदेश बीजेपी के नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने अपनी नई टीम का ऐलान कर दिया है और इस टीम के सामने आते ही जातीय और राजनीतिक समीकरणों पर बहस शुरू हो गई है। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि कुर्मी समाज से आने वाले पंकज चौधरी की टीम में सबसे अधिक प्रतिनिधित्व ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज को मिला है। घोषित सूची के अनुसार प्रदेश कार्यकारिणी में 11 ब्राह्मण नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं, जबकि 9 क्षत्रिय नेताओं को जगह मिली है। इसके बाद अन्य पिछड़ा वर्ग और दूसरे सामाजिक वर्गों के नेताओं को शामिल किया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला सिर्फ संगठन विस्तार नहीं बल्कि आने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर तैयार की गई रणनीति का हिस्सा है।

दरअसल, पिछले कुछ महीनों से उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समाज की नाराजगी को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। यूजीसी से जुड़े विवाद हों या फिर सामान्य वर्ग के हितों से जुड़े दूसरे मुद्दे, विपक्ष लगातार यह माहौल बनाने में जुटा है कि ब्राह्मण और सवर्ण मतदाता बीजेपी से दूरी बना रहे हैं। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती भी लगातार ब्राह्मण समाज को साधने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं।

Also Read – यूपी बीजेपी ने घोषित की नई संगठनात्मक टीम, 46 नेताओं को मिली जिम्मेदारी, नीरज सिंह और पूजा पाल को मिली उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी

इसी बीच बीजेपी ने भी अपनी रणनीति बदलते हुए ब्राह्मण समाज को संदेश देने का प्रयास शुरू किया। डिप्टी सीएम बृजेश पाठक और वरिष्ठ नेता मनोज पांडे लगातार विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए ब्राह्मण समाज के बीच पहुंच रहे हैं। बटुक सम्मान जैसे कार्यक्रमों को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। नई कार्यकारिणी में एक और नाम जिसने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी हैं, वह है नीरज सिंह। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के छोटे बेटे नीरज सिंह को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया है। इसके बाद विपक्ष ने बीजेपी पर परिवारवाद को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि जो पार्टी वर्षों से परिवारवाद के खिलाफ राजनीति करती रही, अब उसी पार्टी में बड़े नेताओं के परिजनों को संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जा रही हैं। हालांकि बीजेपी नेताओं का तर्क है कि संगठन में जिम्मेदारी योग्यता और कार्यक्षमता के आधार पर दी जाती है और नीरज सिंह भी लंबे समय से संगठनात्मक गतिविधियों से जुड़े रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में एक और चर्चा जोर पकड़ रही है। कहा जा रहा है कि प्रदेश कार्यकारिणी की सूची को अंतिम रूप देने में देरी इसलिए हुई क्योंकि शुरुआती सूची को लेकर कई स्तरों पर असहमति थी। चर्चा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राय को ध्यान में रखते हुए कई बदलाव किए गए और उसके बाद दिल्ली से अंतिम मंजूरी मिलने पर सूची जारी की गई। यही वजह है कि कई राजनीतिक जानकार इस नई टीम को योगी आदित्यनाथ की बढ़ती संगठनात्मक ताकत के तौर पर भी देख रहे हैं।

खासकर राजपूत समाज के नेताओं की बड़ी संख्या में मौजूदगी को योगी फैक्टर से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि सिर्फ ब्राह्मण और राजपूत ही नहीं, बीजेपी ने अन्य पिछड़ा वर्ग को भी साधने की कोशिश की है। पाल, कुशवाहा, कुर्मी और अन्य ओबीसी जातियों के नेताओं को भी संगठन में जगह दी गई है। माना जा रहा है कि यह समाजवादी पार्टी के पीडीए फार्मूले का जवाब देने की कोशिश है ताकि बीजेपी का पारंपरिक ओबीसी वोट बैंक मजबूत बना रहे। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि घोषित टीम में किसी भी मुस्लिम चेहरे को जगह नहीं मिली है। इसे लेकर भी राजनीतिक बहस तेज हो गई है। विपक्ष इसे बीजेपी की पुरानी राजनीति का हिस्सा बता रहा है, जबकि बीजेपी का कहना है कि संगठन में चयन कार्यकर्ताओं की भूमिका और योगदान के आधार पर किया गया है। अगर पूरी टीम की संरचना देखें तो 19 प्रदेश उपाध्यक्ष, 8 प्रदेश महामंत्री और 46 प्रदेश मंत्री बनाए गए हैं।

इसके अलावा पश्चिम, ब्रज, कानपुर, अवध, काशी और गोरखपुर क्षेत्रों के लिए अलग-अलग प्रभारियों की नियुक्ति की गई है। युवा मोर्चा, महिला मोर्चा, किसान मोर्चा, पिछड़ा वर्ग मोर्चा, अनुसूचित जाति मोर्चा और अनुसूचित जनजाति मोर्चा के लिए भी नए प्रदेश अध्यक्ष घोषित किए गए हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज को संगठन में ज्यादा प्रतिनिधित्व देने की रणनीति बीजेपी के लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद साबित होगी? क्या यूजीसी और अन्य मुद्दों को लेकर नाराज बताए जा रहे सवर्ण मतदाता फिर से पूरी ताकत के साथ बीजेपी के साथ खड़े होंगे? या फिर विपक्ष की कोशिशें इस वोट बैंक में सेंध लगाने में सफल होंगी? इन सवालों का जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है।

लेकिन इतना जरूर है कि पंकज चौधरी की नई टीम ने यह साफ संकेत दे दिया है कि बीजेपी 2027 की लड़ाई को लेकर कोई जोखिम लेने के मूड में नहीं है। ब्राह्मण, राजपूत, ओबीसी और हर बड़े सामाजिक वर्ग को साधने की कोशिश शुरू हो चुकी है। अब देखना यह होगा कि संगठन में मिला यह प्रतिनिधित्व चुनावी मैदान में वोटों में बदलता है या नहीं। फिलहाल उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण और सवर्ण वोट बैंक को लेकर घमासान चरम पर है और सभी दल अपनी-अपनी चाल चल रहे हैं।