देश की राजनीति का सबसे बड़ा संकट आज विचारों का नहीं, बल्कि भ्रम फैलाने की राजनीति का बनता जा रहा है। जिस मुद्दे पर विपक्ष सरकार को घेरने निकला था, उसी मुद्दे पर अंततः उसे अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ा। घटनाक्रम इस मोड़ पर पहुँचा कि धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया, लेकिन विपक्ष इसे भी अपनी जीत के रूप में स्थापित करने में सफल नहीं दिखा।सोशल मीडिया के दौर में राजनीतिक नैरेटिव अब सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस से तय नहीं होते
Gen-Z हर दावे को परखता है, सवाल पूछता है और तथ्यों की तलाश करता है। यही कारण है कि भावनात्मक नारों से अधिक प्रभाव तथ्यों और जिम्मेदार आचरण का पड़ता है।सबसे गंभीर चिंता हिंसा को लेकर है। आज देश के कई जिलों में हिंसक झड़पों की खबरें सामने आईं। सार्वजनिक और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार बड़ी संख्या में लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया है, जिनमें ऐसे युवक भी बताए जा रहे हैं जो घटनास्थल पर मौजूद थे, भले ही उन्होंने स्वयं तोड़फोड़ न की हो।यह स्थिति हर युवा के लिए एक सीख है। किसी भी आंदोलन में बिना सोचे-समझे भीड़ का हिस्सा बनना भविष्य पर भारी पड़ सकता है। यदि किसी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होती है, तो उसका प्रभाव नौकरी, प्रतियोगी परीक्षाओं और पूरे करियर पर पड़ सकता है।
क्षणिक आवेश कई वर्षों की मेहनत पर भारी पड़ सकता है।लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन हिंसा का नहीं। यदि किसी राजनीतिक दल को भी हिंसा करने वालों से दूरी बनानी पड़ रही है, तो यह संदेश स्पष्ट है कि कानून अपने तरीके से काम करेगा और हिंसा का समर्थन कोई जिम्मेदार राजनीतिक व्यवस्था नहीं कर सकती।देश के युवाओं से अपील है कि वे किसी भी राजनीतिक बहस या आंदोलन में विवेक के साथ भाग लें।
लोकतंत्र की ताकत बहस, मतदान और संविधानसम्मत विरोध में है, न कि पत्थरबाजी, आगजनी और सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान में।राजनीति में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्रहित और कानून का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए। यही लोकतंत्र की असली पहचान है।
उपर्युक्त आलेख पीयूष मिश्रा राष्ट्रीय प्रवक्ता, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी द्वारा लिखित है।






