राधा मोहन दास अग्रवाल की BJP टीम से छुट्टी क्यों? क्या 2027 से पहले बदला योगी कैंप का समीकरण?
योगी आदित्यनाथ के बेहद करीबी नेताओं में गिने जाने वाले राधा मोहन दास अग्रवाल की बीजेपी की नई टीम से छुट्टी ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। सवाल सीधा है—जिस नेता के लिए कभी योगी आदित्यनाथ ने खुद बीजेपी नेतृत्व से टकराव मोल लिया था, आज उसी नेता को नितिन नवीन की नई टीम से बाहर क्यों कर दिया गया? क्या 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के भीतर योगी कैंप के नेताओं की भूमिका सीमित की जा रही है?
क्योंकि राधा मोहन दास अग्रवाल सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि गोरखपुर और पूर्वांचल की राजनीति में योगी के बेहद पुराने और भरोसेमंद चेहरे रहे हैं। साल 2002 का दौर याद कीजिए। गोरखपुर सदर सीट से बीजेपी ने शिव प्रताप शुक्ला को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन योगी आदित्यनाथ ने पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ जाकर राधा मोहन दास अग्रवाल का समर्थन किया। हिंदू महासभा के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले राधा मोहन दास अग्रवाल को हिंदू युवा वाहिनी का भी समर्थन मिला और उन्होंने जीत दर्ज की। इसके बाद 2002, 2007, 2012 और 2017—लगातार चार बार राधा मोहन दास अग्रवाल गोरखपुर शहर से विधायक रहे। 2022 में जब योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर शहर से विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया, तो राधा मोहन दास अग्रवाल ने अपनी सीट मुख्यमंत्री योगी के लिए छोड़ दी।
इसके बाद पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेजा और बीजेपी संगठन में राष्ट्रीय महासचिव जैसी बड़ी जिम्मेदारी भी दी। कर्नाटक और राजस्थान जैसे राज्यों के प्रभारी के तौर पर भी उन्होंने काम किया। लेकिन अब नितिन नवीन की नई टीम में उनकी जगह नहीं है। उनकी जगह स्मृति ईरानी और हरीश द्विवेदी को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है। यहीं से सवाल खड़े होते हैं—क्या यह सिर्फ संगठन में सामान्य फेरबदल है या इसके पीछे कोई बड़ी राजनीतिक रणनीति है? खासकर तब, जब यूपी में 2027 का विधानसभा चुनाव बेहद करीब है। राधा मोहन दास अग्रवाल की गोरखपुर और पूर्वांचल में अपनी पकड़ और साफ-सुथरी छवि मानी जाती है।
ऐसे में उनकी राष्ट्रीय संगठन से छुट्टी को लेकर राजनीतिक मायने तलाशे जा रहे हैं। हालांकि इसे सीधे तौर पर योगी आदित्यनाथ के खिलाफ फैसला मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन सवाल जरूर बड़ा है—क्या 2027 से पहले बीजेपी संगठन में नई ताकत और नए समीकरण तैयार किए जा रहे हैं, और क्या इस बदलाव में योगी के पुराने भरोसेमंद चेहरों की भूमिका घट रही है? आने वाले दिनों में इसकी तस्वीर और साफ हो सकती है।
