लखनऊ, 30 अगस्त। उत्तर प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की गुणवत्ता की जांच को और अधिक प्रभावी एवं आधुनिक बनाने की दिशा में योगी सरकार ने कदम तेज कर दिए हैं। उत्तर प्रदेश जल निगम (ग्रामीण) की नई स्टेट लैबोरेटरी को विश्वस्तरीय परीक्षण सुविधाओं से लैस किया जा रहा है। इसमें भविष्य में पेयजल में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक और PFAS जैसे उभरते प्रदूषकों की जांच की सुविधा विकसित करने की योजना है।
नई स्टेट लैबोरेटरी भवन का निर्माण तेजी से कराया जा रहा है। इसके लिए अत्याधुनिक विश्लेषणात्मक उपकरणों की व्यवस्था की जा रही है। माइक्रोप्लास्टिक और PFAS की जांच के लिए आवश्यक उन्नत उपकरणों को वार्षिक कार्ययोजना में भी शामिल किया गया है। इससे प्रदेश में पेयजल की गुणवत्ता की निगरानी को वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से और मजबूत किया जा सकेगा।
हाल ही में उत्तर प्रदेश के दौरे पर आए भारत सरकार के पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के सचिव ने उत्तर प्रदेश जल निगम (ग्रामीण) की मौजूदा स्टेट लैबोरेटरी का निरीक्षण किया था। इस दौरान जल गुणवत्ता परीक्षण की मौजूदा सुविधाओं, उन्नत उपकरणों और भविष्य में विकसित की जाने वाली परीक्षण क्षमताओं की जानकारी ली गई। उन्होंने माइक्रोप्लास्टिक और PFAS जैसे उभरते प्रदूषकों की जांच की सुविधा राज्य स्तरीय प्रयोगशाला में विकसित करने पर जोर दिया।
ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की गुणवत्ता की निगरानी के लिए प्रदेश में व्यापक प्रयोगशाला नेटवर्क काम कर रहा है। इसमें एक स्टेट लैबोरेटरी, तीन क्षेत्रीय, 72 जिला स्तरीय और 62 वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट प्रयोगशालाएं शामिल हैं। राज्य स्तरीय प्रयोगशालाओं में उन्नत परीक्षण सुविधाएं उपलब्ध हैं और 50 मानक NABL से प्रमाणित हैं। इस नेटवर्क के माध्यम से जल जीवन मिशन के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की नियमित जांच की जाती है और आवश्यकता के अनुसार पानी के नमूनों का विस्तृत परीक्षण भी कराया जाता है।
माइक्रोप्लास्टिक और PFAS दो अलग-अलग श्रेणी के प्रदूषक हैं। माइक्रोप्लास्टिक सामान्यतः 5 मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक कणों को कहा जाता है, जबकि PFAS फ्लोरीन युक्त कृत्रिम रसायनों का एक व्यापक समूह है। पर्यावरण में लंबे समय तक बने रहने के कारण इन्हें अक्सर ‘फॉरएवर केमिकल्स’ कहा जाता है।
माइक्रोप्लास्टिक की जांच में नमूने को बाहरी प्लास्टिक कणों से दूषित होने से बचाना बेहद जरूरी होता है। इसके बाद नमूने से कणों को अलग कर माइक्रोस्कोप के जरिए उनकी संख्या, आकार, आकृति और रंग का परीक्षण किया जाता है। पॉलीमर की सटीक पहचान के लिए FTIR या रमन माइक्रोस्कोपी जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
प्रदेश में पेयजल की गुणवत्ता की निगरानी जल जीवन मिशन के निर्धारित राष्ट्रीय प्रोटोकॉल और लागू भारतीय मानकों के अनुरूप की जाती है। प्रयोगशालाओं के साथ-साथ ग्राम स्तर पर प्रशिक्षित महिलाओं और जल गुणवत्ता निगरानी समूहों को फील्ड टेस्टिंग किट के जरिए प्रारंभिक जांच की जिम्मेदारी दी गई है। जरूरत के अनुसार नमूनों को प्रयोगशालाओं में भेजकर विस्तृत परीक्षण कराया जाता है।
नई स्टेट लैबोरेटरी के जरिए प्रदेश में आधुनिक रेफरल प्रयोगशाला की क्षमता विकसित होगी। माइक्रोप्लास्टिक और PFAS जैसे उभरते प्रदूषकों की जांच की सुविधा मिलने से भविष्य में बेसलाइन डाटा तैयार करने, प्रदूषण के संभावित स्रोतों की पहचान और वैज्ञानिक निगरानी में मदद मिलेगी। साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर विकसित होने वाले नए मानकों और दिशा-निर्देशों के अनुरूप प्रदेश की परीक्षण व्यवस्था को तैयार किया जा सकेगा।
उत्तर प्रदेश जल निगम (ग्रामीण) के प्रबंध निदेशक योगेश कुमार ने कहा कि नई स्टेट लैबोरेटरी भवन का निर्माण तेजी से कराया जा रहा है। इसे आधुनिक और विश्वस्तरीय परीक्षण सुविधाओं से सुसज्जित करने की दिशा में काम चल रहा है। उन्होंने कहा कि माइक्रोप्लास्टिक और PFAS जैसे उभरते प्रदूषकों की जांच की क्षमता विकसित करना भविष्य की जल गुणवत्ता चुनौतियों को देखते हुए महत्वपूर्ण पहल है। इससे जल निगम के साथ-साथ आवश्यकता पड़ने पर अन्य सरकारी विभागों और संस्थाओं को भी उच्च स्तरीय जल परीक्षण की सुविधा मिल सकेगी।
