गोंडा में निषाद समाज के विनोद साहनी की हत्या ने यूपी की सियासत में भूचाल ला दिया है…एक तरफ संजय निषाद सड़क पर उतरकर हत्यारों के एनकाउंटर की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ अब सोशल मीडिया पर वायरल विनोद साहनी की वो पोस्ट सामने आ रही हैं, जिनमें ब्राह्मण-क्षत्रिय समाज, उनकी महिलाओं और देवी-देवताओं को लेकर बेहद आपत्तिजनक बातें लिखी गई थीं। तो क्या सोशल मीडिया पर जातीय नफरत अब पोस्ट से निकलकर सीधे सड़क पर हत्या तक पहुंच गई है? गोंडा से उठे इस सवाल की गूंज लखनऊ तक सुनाई दे रही है… क्योंकि अगर आज जाति के नाम पर गाली दी जाएगी, कल उसी गाली के जवाब में हिंसा होगी, तो फिर हिंदू समाज को बांटने वाली इस आग को रोकने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

दरअसल गोंडा में बर्तन कारोबारी विनोद साहनी की हत्या के बाद निषाद समाज में भारी आक्रोश देखने को मिला। निषाद पार्टी के अध्यक्ष और प्रदेश सरकार में मंत्री संजय निषाद धरने पर बैठ गए। उन्होंने पुलिस से हत्यारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की और कहा कि आरोपियों को गिरफ्तार किया जाए या उनका एनकाउंटर किया जाए। इस दौरान बिहार के पूर्व मंत्री मुकेश सहनी भी संजय निषाद के साथ मौजूद रहे। हालात को देखते हुए इलाके में भारी पुलिस बल तैनात किया गया और पूरे क्षेत्र को छावनी में तब्दील कर दिया गया। पुलिस ने इस मामले में अब तक शुभम सिंह उर्फ गोलू, सुभाष सिंह और आकाश सिंह को गिरफ्तार किया है। वहीं तीन पुलिसकर्मियों के निलंबन की भी कार्रवाई हुई है। लेकिन अब इस हत्याकांड में सोशल मीडिया का एंगल भी सामने आया है। पुलिस के मुताबिक विनोद साहनी सोशल मीडिया पर लगातार जातिगत टिप्पणियां करता था। उसकी कुछ पोस्ट अब वायरल हैं, जिनमें ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज के साथ-साथ देवी-देवताओं और महिलाओं को लेकर बेहद आपत्तिजनक बातें लिखी गई थीं। एक पोस्ट में धार्मिक कथा के पात्रों को लेकर बेहद विवादित टिप्पणी की गई। दूसरी पोस्ट में कलश यात्रा को लेकर महिलाओं पर टिप्पणी करते हुए ओबीसी और दलित समाज से जुड़े लोगों को संबोधित किया गया। इन पोस्ट को लेकर सामान्य वर्ग के कुछ युवाओं में नाराजगी थी और पुलिस अब इसी पूरे घटनाक्रम की जांच कर रही है। लेकिन यहां एक बात बिल्कुल साफ होनी चाहिए—किसी की सोशल मीडिया पोस्ट कितनी भी आपत्तिजनक क्यों न हो, हत्या किसी भी कीमत पर जायज नहीं हो सकती। अगर किसी पोस्ट से किसी समाज की भावनाएं आहत हुई थीं तो कानून का रास्ता खुला था। शिकायत हो सकती थी, मुकदमा दर्ज हो सकता था और कानूनी कार्रवाई हो सकती थी। लेकिन कानून हाथ में लेकर किसी की जान लेना अपराध है और हत्या में शामिल हर आरोपी के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही सरकार और पुलिस को अब उस बड़े खतरे पर भी ध्यान देना होगा, जो सोशल मीडिया के जरिए लगातार बढ़ रहा है। जाति के नाम पर गालियां… एक समाज के खिलाफ दूसरे समाज को भड़काने वाली पोस्ट… देवी-देवताओं को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां… और महिलाओं को लेकर अश्लील भाषा। अगर इस सब पर समय रहते रोक नहीं लगी तो सोशल मीडिया की लड़ाई कभी भी सड़क की हिंसा में बदल सकती है। राजनीतिक दल जाति देखकर अपनी राजनीति चमका सकते हैं, लेकिन जब जातीय नफरत हिंसा में बदलती है तो उसका शिकार आम आदमी होता है। इसलिए गोंडा की ये घटना सिर्फ एक हत्या की कहानी नहीं है… ये एक चेतावनी भी है। हत्या के आरोपियों पर कानून का डंडा चलना चाहिए, लेकिन सोशल मीडिया पर जातीय नफरत फैलाकर समाज में आग लगाने वालों पर भी समय रहते कार्रवाई होनी चाहिए। क्योंकि सवाल सिर्फ ये नहीं कि विनोद साहनी की हत्या क्यों हुई…सवाल ये भी है कि सोशल मीडिया की ये नफरत अगर इसी तरह सड़क तक पहुंचती रही, तो देश में बवाल मचना तय है
