नोएडा: उत्तर प्रदेश की हाई-प्रोफाइल विधानसभा सीटों में शामिल नोएडा में 2027 का चुनावी मुकाबला दिलचस्प होने की उम्मीद है। यहां लड़ाई सिर्फ उम्मीदवारों के बीच नहीं होगी, बल्कि शहरी वोटर, किसान मुद्दे, विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर और राजनीतिक संगठन की ताकत भी चुनावी नतीजे को प्रभावित कर सकती है। पिछले दो विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह बड़ी जीत दर्ज की है, उसके बाद विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस मजबूत बढ़त को कम करना है।
नोएडा विधानसभा सीट संख्या 61 है और पिछले एक दशक में यह बीजेपी के मजबूत गढ़ के तौर पर उभरी है। 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के पंकज सिंह ने समाजवादी पार्टी के सुनील चौधरी को करीब 1 लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से हराया था। इसके बाद 2022 में बीजेपी की जीत का अंतर और भी बढ़ गया।
2022 के चुनाव में पंकज सिंह को 2,44,319 वोट मिले, जबकि सपा के सुनील चौधरी को 62,806 वोट हासिल हुए। दोनों के बीच जीत का अंतर करीब 1,81,513 वोट रहा। ऐसे में 2027 में विपक्ष के सामने सिर्फ बीजेपी को हराने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि इस बड़े वोट अंतर को भी पाटना होगा।
नोएडा का चुनावी गणित गांवों से अलग
नोएडा की राजनीति उत्तर प्रदेश की पारंपरिक ग्रामीण विधानसभा सीटों से काफी अलग है। यहां बड़ी संख्या में हाईराइज सोसायटियां, आईटी प्रोफेशनल्स, व्यापारी, नौकरीपेशा वर्ग और मिडिल क्लास वोटर हैं। ऐसे में बिजली, सड़क, ट्रैफिक, मेट्रो कनेक्टिविटी, सुरक्षा, प्रदूषण, पानी और शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में रह सकते हैं।
हालांकि नोएडा का आधुनिक और शहरी चेहरा पूरी तस्वीर नहीं है। विधानसभा क्षेत्र में पुराने गांव और किसान आबादी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बरौला, भंगेल, मामूरा और चौड़ा जैसे इलाकों में जमीन, मुआवजा, विकसित भूखंड और प्राधिकरण से जुड़े मुद्दे चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं।
BJP के सामने क्या चुनौती?
बीजेपी के पक्ष में सबसे बड़ा फैक्टर उसका मजबूत संगठन और पंकज सिंह की लगातार दो बड़ी जीत हैं। 2027 में पार्टी इसी संगठनात्मक नेटवर्क और विकास के मुद्दे के साथ मैदान में उतरने की कोशिश कर सकती है।
हालांकि बड़ी जीत के बावजूद स्थानीय स्तर के मुद्दों और मतदाताओं की नाराजगी को नजरअंदाज करना किसी भी पार्टी के लिए जोखिम भरा हो सकता है। किसान, फ्लैट खरीदार, सोसायटी निवासी और स्थानीय व्यापारियों से जुड़े मुद्दे चुनावी विमर्श को प्रभावित कर सकते हैं।
विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती
सपा और कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग वर्गों तक अपनी राजनीतिक पहुंच मजबूत करना होगी। नोएडा जैसे शहरी क्षेत्र में सिर्फ पारंपरिक राजनीतिक मुद्दों के भरोसे मुकाबला आसान नहीं होगा।
अगर विपक्ष स्थानीय समस्याओं को प्रभावी तरीके से उठाता है और बीजेपी विरोधी वोटों में बेहतर तालमेल बनाने में सफल रहता है, तो मुकाबला पहले की तुलना में दिलचस्प हो सकता है। हालांकि फिलहाल किसी भी संभावित नतीजे को लेकर निश्चित दावा करना जल्दबाजी होगी।
2027 का चुनाव अभी दूर है और उम्मीदवारों, गठबंधन और स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव संभव है। फिलहाल नोएडा में बीजेपी का पलड़ा भारी दिखाई देता है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या पंकज सिंह 2027 में एक और बड़ी जीत दर्ज करेंगे या किसान, फ्लैट खरीदार और स्थानीय मुद्दे बीजेपी के मजबूत किले में पहली बड़ी दरार डाल पाएंगे?
