उत्तर प्रदेश की राजनीति में आजमगढ़ का नाम हमेशा से बेहद अहम रहा है। इसी आजमगढ़ सदर विधानसभा सीट पर 2027 का मुकाबला एक बार फिर दिलचस्प होने के संकेत दे रहा है। सीट नंबर 347 पर एक तरफ समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता दुर्गा प्रसाद यादव का लंबा राजनीतिक प्रभाव है, तो दूसरी तरफ बीजेपी लगातार अपने जनाधार को मजबूत करने की कोशिश में जुटी है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 2027 में सपा एक बार फिर अपना मजबूत किला बचा पाएगी या बीजेपी पिछली हार का हिसाब बराबर करते हुए बड़ा उलटफेर करेगी?
2022 में 16 हजार वोटों का अंतर
आजमगढ़ सदर विधानसभा सीट पर 2022 का चुनाव मुकाबले की तस्वीर समझने के लिए सबसे अहम है। समाजवादी पार्टी के दुर्गा प्रसाद यादव ने 1,00,813 वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी। वहीं बीजेपी के अखिलेश कुमार मिश्रा ‘गुड्डू’ को 84,777 वोट मिले थे। दोनों के बीच जीत का अंतर 16,036 वोट रहा।वहीं बहुजन समाज पार्टी के सुशील कुमार सिंह को 39,281 वोट मिले और वह तीसरे स्थान पर रहे। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के मुताबिक सीट पर कुल 3,96,271 मतदाता दर्ज थे और मतदान प्रतिशत करीब 59.6 फीसदी रहा।यानी 2022 में बीजेपी ने सपा को कड़ी चुनौती जरूर दी, लेकिन दुर्गा प्रसाद यादव अपनी बढ़त बचाने में कामयाब रहे। अब 2027 में यही 16 हजार से ज्यादा वोटों का अंतर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है।
तीन चुनाव से दुर्गा प्रसाद यादव का कब्जा
आजमगढ़ सदर की कहानी सिर्फ 2022 के चुनाव तक सीमित नहीं है। उपलब्ध चुनावी रिकॉर्ड के मुताबिक दुर्गा प्रसाद यादव 2012, 2017 और 2022 के लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं। यही वजह है कि आजमगढ़ सदर को सपा के मजबूत राजनीतिक आधार वाली सीटों में गिना जाता है।दुर्गा प्रसाद यादव की लगातार जीत ने उन्हें इस सीट की राजनीति का प्रमुख चेहरा बनाया है। ऐसे में 2027 में बीजेपी के सामने सिर्फ चुनाव जीतने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि उसे उस राजनीतिक और सामाजिक आधार में सेंध लगानी होगी, जिसने लंबे समय से सपा को मजबूती दी है।
बीजेपी के सामने बड़ी चुनौती
बीजेपी के लिए आजमगढ़ सदर में सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि क्या वह 2022 की हार के अंतर को कम करने के बाद अब जीत तक पहुंच सकती है? पार्टी के सामने उम्मीदवार की मजबूत दावेदारी, बूथ स्तर का संगठन, स्थानीय मुद्दों पर पकड़ और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच समर्थन बढ़ाने की चुनौती होगी।वहीं समाजवादी पार्टी की चुनौती भी कम नहीं है। पार्टी को अपने पारंपरिक समर्थक आधार को एकजुट रखने के साथ-साथ बीजेपी की मजबूत चुनावी मशीनरी का मुकाबला करना होगा।
लोकसभा चुनाव का असर कितना?
आजमगढ़ लोकसभा चुनाव 2024 का परिणाम भी विधानसभा 2027 के राजनीतिक माहौल को समझने में अहम माना जा सकता है। 2024 में समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव ने बीजेपी के दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ को हराया था। ऐसे में लोकसभा चुनाव के बाद जिले में बने राजनीतिक माहौल और उसके बाद हुए स्थानीय राजनीतिक बदलावों का असर विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिल सकता है।हालांकि विधानसभा चुनाव का समीकरण लोकसभा से अलग होता है। उम्मीदवार, स्थानीय संगठन, क्षेत्रीय मुद्दे और बूथ स्तर की रणनीति कई बार पूरे चुनाव का रुख बदल देती है।
जातीय समीकरण से लेकर विकास तक होंगे मुद्दे
2027 में आजमगढ़ सदर की लड़ाई केवल सपा बनाम बीजेपी नहीं होगी। जातीय और सामाजिक समीकरणों के साथ रोजगार, सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं।फिलहाल 2027 के उम्मीदवारों और अंतिम चुनावी समीकरणों पर तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। लेकिन इतना तय है कि आजमगढ़ सदर में मुकाबला बेहद अहम रहने वाला है।एक तरफ तीन चुनावों की जीत और दुर्गा प्रसाद यादव का लंबा राजनीतिक प्रभाव है, तो दूसरी तरफ बीजेपी पिछली हार के अंतर को खत्म कर सत्ता की ओर बढ़ने की कोशिश करेगी। अब असली सवाल यही है—2027 में आजमगढ़ सदर फिर ‘दुर्गा मॉडल’ पर भरोसा करेगा या कमल को मौका देकर सियासी तस्वीर बदल देगा?
