Home Political news रावण की ढाल बना ब्राह्मण वकील! भीम सेना सन्न !

रावण की ढाल बना ब्राह्मण वकील! भीम सेना सन्न !

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chandra shekhar azad ravan

राजनीति कभी-कभी ऐसे मोड़ दिखाती है कि खुद कहानी भी शर्मिंदा हो जाए। एक नेता जो मंचों पर ब्राह्मणवाद को सबसे बड़ा दुश्मन बताते हुए गरजता है… वही नेता जब अदालत की चौखट पर खड़ा मिलता है, तो उसके साथ खड़ा होता है एक ब्राह्मण वकील। कहानी यहीं से दिलचस्प हो जाती है। भीम आर्मी प्रमुख और सांसद चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ अपने राजनीतिक भाषणों में ब्राह्मणवाद पर सबसे तीखे हमले करने के लिए जाने जाते हैं।

नफरत या इतिहास का दर्द? चंद्रशेखर आज़ाद का बदला हुआ रुख”

उनकी सभाओं में अक्सर ब्राह्मणों पर कटाक्ष, आरोप और आक्रामक बयानबाज़ी सुनाई देती है। भीम आर्मी के कुछ समर्थक तो इस मुद्दे पर खुलकर अपमानजनक भाषा तक इस्तेमाल करते दिखते हैं, और यही उनकी राजनीति का बड़ा आधार भी माना जाता है। लेकिन जैसे ही हालात बदलते हैं, राजनीति की भाषा भी अचानक बदलती दिखाई देती है और यही इस कहानी का मोड़ है।हाल ही में एक कार्यक्रम में चंद्रशेखर आज़ाद से पूछा गया कि उन्हें हिंदू धर्म और ब्राह्मणों से इतनी नफरत क्यों है। जवाब में उन्होंने ब्राह्मणवादी व्यवस्था को अपने समाज के ऐतिहासिक शोषण का कारण बताया।

कोर्ट के कटघरे में चंद्रशेखर

जब उनसे पूछा गया कि क्या उनके पिता, दादा और पूर्वजों को भी पानी पीने से रोका गया था, तो उन्होंने बाबा साहब अंबेडकर का संदर्भ देकर बात को घुमा दिया और फिर ब्राह्मणवाद पर आरोपों की एक और श्रृंखला शुरू कर दी।लेकिन जब बात राजनीति की चौपाल से निकलकर न्यायालय की दहलीज तक पहुँची और मामला 2017 सहारनपुर हिंसा के गंभीर आरोपों पर आकर अटक गया तो तस्वीर बिल्कुल अलग हो गई। इस मामले में चंद्रशेखर आज़ाद पर हत्या के प्रयास, आगज़नी, जातीय तनाव फैलाने और कई गंभीर धाराओं में केस दर्ज हैं ।

पुलिस चार्जशीट दाखिल कर चुकी है और कानूनी लड़ाई मुश्किल दिशा में जा रही थी। ऐसे में उन्हें एक ऐसे वकील की जरूरत पड़ी जो इस जटिल मामले में उन्हें रास्ता दिखा सके। और फिर… राजनीति ने वह मोड़ दिखाया, जिसे देखकर हर कोई हैरान रह गया। ब्राह्मणवाद पर रोज़ हमला करने वाले चंद्रशेखर आज़ाद ने अपनी पैरवी के लिए ब्राह्मण अधिवक्ता सुशील शुक्ला को चुना। वही सुशील शुक्ला, जिनकी कानूनी विशेषज्ञता और तर्कों ने कोर्ट में चंद्रशेखर आज़ाद की तरफ से मजबूती से दलीलें रखीं। उन्होंने अदालत में तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार एक ही घटना से जुड़ी सभी शिकायतों को एक ही मुकदमे में जोड़ा जाना चाहिए, अलग-अलग FIR दर्ज करना कानून के सिद्धांतों के खिलाफ है।

यानी कि वही ब्राह्मण वकील, जिनके प्रति उनके भाषणों में अक्सर तंज नजर आता है, अब अदालत में उनके सबसे बड़े सहारा बनकर खड़े थे।यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ एक कानूनी कहानी नहीं है, बल्कि विचारधारा और राजनीति के बीच की दूरी को साफ दिखाता है। मंचों पर जिस ब्राह्मणवाद को वे सबसे बड़ा अत्याचार बताते हैं, उसी समाज के एक व्यक्ति के कंधों पर अब उनकी पूरी कानूनी ढाल टिकी हुई है। राजनीति की यही विडंबना इसे दिलचस्प भी बनाती है और सोचने पर मजबूर भी करती है।आप अपनी राय हमको जरूर दीजियेगा और बताएगा कि रावण को ब्राह्मण वकील रखने की आखिर आवशयकता क्यों पड़ी।

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