धर्मनगरी वृंदावन की पावन धरा पर हाल ही में एक दुर्लभ और हृदयस्पर्शी दृश्य देखने को मिला, जब भारत से लंदन तक की 25 हजार किलोमीटर लंबी विश्व शांति पदयात्रा पर निकले जैन मुनियों के एक दल ने श्री केलि कुंज पहुंचकर विख्यात संत श्री प्रेमानंद जी महाराज से भेंट की यह मुलाकात केवल दो संप्रदायों के संतों का मिलन नहीं थी, बल्कि वैष्णव भक्ति और जैन धर्म की कठोर तपस्या का एक अद्भुत आध्यात्मिक संगम थी।
25 हजार किमी की कठिन पदयात्रा और विश्व शांति का संकल्प
विश्व शांति, अहिंसा और आत्म-संयम के संदेश को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से जैन मुनियों का यह दल भारत से लंदन तक पैदल यात्रा कर रहा है। इसी क्रम में वृंदावन पहुंचकर संतों ने प्रेमानंद महाराज से भेंट कर आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त किया, संवाद के दौरान जैन मुनियों ने प्रेमानंद जी महाराज के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त किया। महाराज जी ने जैन धर्म की कठोर साधना, तप और इंद्रिय संयम की सराहना करते हुए कहा, “ब्रह्मचर्य और इंद्रिय संयम ही वास्तविक आध्यात्मिक बल है। इसके बिना परमात्मा के मार्ग की प्राप्ति संभव नहीं।”
हंसरत्न सूरीश्वर जी की तपस्या को नमन
इस अवसर पर प्रसिद्ध जैन संत आचार्य श्री हंसरत्न सूरीश्वर जी महाराज की कठिन साधना का भी उल्लेख हुआ, महीनों तक केवल जल पर उपवास कर विश्व रिकॉर्ड स्थापित करने वाले सूरीश्वर जी की तपस्या को नमन करते हुए प्रेमानंद महाराज ने कहा कि ऐसी साधना केवल ईश्वरीय कृपा और अदम्य आत्मबल से ही संभव है।
मन की चंचलता का समाधान
जब जैन साध्वियों ने मन की चंचलता को लेकर प्रश्न किया, तो प्रेमानंद जी महाराज ने अत्यंत सरल और सारगर्भित मार्गदर्शन दिया उन्होंने कहा, “मन का स्वभाव ही भटकना है, लेकिन निरंतर नाम-जप और आत्म-चिंतन के माध्यम से ही इसे वश में किया जा सकता है।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि चाहे मार्ग अहिंसा और तप का हो या प्रेम और भक्ति का, अंतिम लक्ष्य अहंकार का विसर्जन ही है।
जो विकारों को जीते, वही सच्चा साधक
मुलाकात के अंत में प्रेमानंद महाराज ने एक गहरा संदेश देते हुए कहा कि जो अपने भीतर के काम, क्रोध और लोभ जैसे विकारों पर विजय पा ले, वही सच्चा ‘जिन’ (जैन) है और वही वास्तविक ‘वैष्णव’ भी, उन्होंने कहा कि वेशभूषा भले अलग हो, लेकिन सत्य और आत्म-कल्याण का स्वरूप एक ही होता है, इस अवसर पर जैन संतों ने प्रेमानंद महाराज के राधा नाम के प्रति समर्पण की सराहना की, वहीं महाराज जी ने जैन मुनियों को समाज के लिए प्रकाश स्तंभ बताते हुए उनकी साधना को प्रेरणादायी कहा।
यह ऐतिहासिक भेंट समाज को यह संदेश देती है कि धर्म विभाजन के लिए नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान, सह-अस्तित्व और आत्म-उन्नति के लिए है।







