दिव्यांगता को हराकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन करने वाले पैरा तीरंदाज राकेश कुमार आज सरकारी सिस्टम की अनदेखी से परेशान हैं। देश के लिए कई मेडल जीतने वाले इस खिलाड़ी को अब नौकरी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
जम्मू और कश्मीर के कटरा जिले के रहने वाले 41 वर्षीय राकेश ने 12 राष्ट्रीय और 28 अंतरराष्ट्रीय पदक जीते हैं। उन्होंने एशियन पैरा गेम्स 2018 समेत कई बड़ी प्रतियोगिताओं में गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किए हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके पास 14 स्वर्ण, 7 रजत और 7 कांस्य पदक हैं।
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राकेश का कहना है कि उन्होंने देश के लिए इतनी उपलब्धियां हासिल कीं, लेकिन सरकार से उन्हें सिर्फ निराशा मिली। उन्होंने बताया कि 12 जुलाई 2025 को जम्मू-कश्मीर खेल परिषद के सचिव को नौकरी और नकद इनाम जारी करने के लिए पत्र लिखा था, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला। उनका आरोप है कि सरकारी नियमों में पदक विजेताओं को खेल कोटे से नौकरी देने की बात साफ लिखी है, फिर भी हाल ही में जारी सूची में उनका नाम नहीं है।
राकेश ने यह भी कहा कि उन्होंने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को ईमेल किया और केंद्रीय खेल मंत्री मनसुख मांडविया से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। उनका आरोप है कि पदक जीतने के बाद जिन नकद पुरस्कारों का वादा किया गया था, वह भी अभी तक नहीं मिला।
अब सवाल उठ रहा है कि अगर देश के लिए मेडल जीतने वाला खिलाड़ी ही अपने हक के लिए भटकता रहे, तो जिम्मेदारी किसकी है? क्या यह सिर्फ लापरवाही है या फिर पैरा खिलाड़ियों के साथ भेदभाव? सरकारें सम्मान तो देती हैं, लेकिन क्या वह सम्मान सिर्फ मंच तक ही सीमित रह जाता है?







