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हाथियों से खिंचवाया गया, तलवारों से किया गया प्रहार फिर भी अडिग रहे भोलेनाथ

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हाथियों से खिंचवाया गया, तलवारों से किया गया प्रहार फिर भी अडिग रहे भोलेनाथ

पीलीभीत के मोटे बाबा मंदिर की आस्था और संघर्ष की गाथा

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जनपद के बिलसंडा क्षेत्र स्थित बुधौली गांव में बना मोटे बाबा भगवान भोलेनाथ का मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सनातन आस्था, संघर्ष और विश्वास का प्रतीक माना जाता है। यह मंदिर उस दौर की याद दिलाता है, जब धार्मिक स्थलों को मिटाने के प्रयास किए गए, लेकिन आस्था की जड़ें और भी मजबूत होकर उभरीं।


17वीं सदी से जुड़ा इतिहास

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मोटे बाबा मंदिर की परंपरा 17वीं सदी तक जाती है। गांव के बुजुर्गों का कहना है कि मंदिर की प्राचीनता इतनी अधिक है कि इसके निर्माण का सटीक काल कोई नहीं बता पाता। यह मंदिर रुहेला काल से जुड़ा माना जाता है—एक ऐसा समय जब सत्ता संघर्ष और धार्मिक टकराव आम थे।


जब हाथी भी नहीं हिला सके शिवलिंग

किंवदंतियों के अनुसार, उस दौर में शिवलिंग को नष्ट करने के कई प्रयास किए गए। शिवलिंग को उखाड़ने के लिए हाथियों से खिंचवाया गया और जमीन खुदवाई गई, लेकिन वह अपनी जगह से नहीं हिला। इसके बाद तलवारों से प्रहार किए गए, जिनके निशान आज भी शिवलिंग पर मौजूद बताए जाते हैं।

हाथियों से खींचे जाने के दौरान शिवलिंग थोड़ा टेढ़ा हो गया, जो आज मोटे बाबा मंदिर की सबसे बड़ी पहचान बन चुका है। श्रद्धालुओं के लिए यह टेढ़ापन इस बात का प्रतीक है कि आस्था पर चाहे जितना भी प्रहार हो, भोलेनाथ अडिग रहते हैं।


श्रद्धा से जुड़ी विशेष मान्यता

मंदिर से जुड़ी एक और मान्यता इसे और भी विशिष्ट बनाती है। कहा जाता है कि यदि कोई भक्त पूर्ण श्रद्धा और विनम्रता के साथ दोनों हाथों से शिवलिंग को छाती से लगाने का प्रयास करता है, तो शिवलिंग मानो उसकी ओर झुक जाता है। यह अनुभव भक्तों के लिए गहरी आस्था और आत्मिक जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है।


पीलीभीत से मुनेंद्र सिंह की रिपोर्ट

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