News Algebra के ट्विटर हैंडल के अनुसार – सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि आरक्षित श्रेणी के वे उम्मीदवार जिन्होंने सामान्य अंक से अधिक कटऑफ़ प्राप्त किए हैं, उन्हें अनारक्षित माना जाना चाहिए। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक भर्ती में अनारक्षित या ‘जनरल’ श्रेणी की सीटें केवल सामान्य वर्ग के लिए नहीं होतीं, बल्कि यह योग्यता-आधारित सीटें होती हैं, जो किसी भी सामाजिक श्रेणी के उम्मीदवार के लिए खुली होती हैं। इस निर्णय में कहा गया कि यदि कोई आरक्षित श्रेणी का उम्मीदवार सामान्य मानकों पर चयनित होता है, तो उसे अनारक्षित सीट पर गिना जाएगा, जिससे संविधान के समानता के सिद्धांत को बल मिलता है।
न्यायमूर्ति सतीश चंद्र ने यह भी कहा कि “इन छात्रों को उनके आरक्षित कोटे तक सीमित नहीं किया जा सकता है।
योग्यता आधारित “अनारक्षित” श्रेणी की व्याख्या –
न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने इस बात पर बल दिया है कि अनारक्षित श्रेणी कोई विशेष कोटा नहीं है, बल्कि यह एक सार्वजनिक श्रेणी है जो हर एक नागरिक के लिए उपलब्ध है, बशर्ते वह तय योग्यता मानकों को पूरा करता हो। पीठ ने यह भी कहा कि यदि किसी आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को उसकी योग्यता के बावजूद अनारक्षित श्रेणी से बाहर रखा जाए तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 व 16 का उल्लंघन माना जाएगा।
“मेरिट-इंड्यूस्ड शिफ्ट” का सिद्धांत –
न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ने फैसले में “merit-induced shift” की अवधारणा को स्पष्ट किया। यदि अनुसूचित जाति, जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग का कोई उम्मीदवार बिना किसी विशेष छूट (जैसे आयु में छूट या शुल्क में रियायत) के सामान्य मानकों पर चयनित होता है, तो उसे खुली श्रेणी का उम्मीदवार माना जाएगा। इससे आरक्षित सीटें अन्य पात्र उम्मीदवारों के लिए सुरक्षित रहेंगी और सामाजिक न्याय के उद्देश्य को भी पूरा किया जा सकेगा।
मामले की पृष्ठभूमि और उच्च न्यायालय का पलटा गया निर्णय –
यह मामला 2013 की एयरपोर्ट्स ऑथोरिटी ऑफ इंडिया की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा था, जिसमें “जूनियर असिस्टेंट (फायर सर्विस)” पदों की भर्ती हुई थी। इसमें उच्च अंक पाने वाले आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों को अनारक्षित सीटों पर नियुक्त किया गया, जिसे एक सामान्य वर्ग के उम्मीदवार ने केरल उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। 2020 में हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के पक्ष में निर्णय दिया, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है, उसके साथ ही, इसे संविधान की समानता के सिद्धांत के विरुद्ध भी बताया।
सार्वजनिक भर्ती में व्यापक प्रभाव –
यह फैसला केंद्र ओर राज्य की सभी भर्ती एजेंसियों के लिए एक स्पष्ट दिशानिर्देश प्रदान करता है। यह न केवल योग्यता का सम्मान करता है, बल्कि आरक्षण की सामाजिक समावेशन की भावना को भी बरकरार रखता है। आगे चलके यह निर्णय उन सभी प्रतियोगी परीक्षाओं और नियुक्तियों में मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में कार्य करेगा जहाँ समानता और सामाजिक न्याय दोनों को संतुलित करना आवश्यक है।
रमेश श्रीवत्स के इस निर्णय पर विचार कुछ इस प्रकार हैं –
जहां तक मुझे पता है, यह हमेशा से ऐसा ही रहा है। लेकिन मुझे नहीं लगता ये योग्यता की ओर कोई बदलाव है। इससे तो बस यही सुनिश्चित हो रहा है कि आरक्षण के माध्यम से प्रवेश पाने वाले लोग 100% योग्य नहीं हैं।







