उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर बवंडर उठ खड़ा हुआ है। वजह है बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती। बीते दिनों सोशल मीडिया पर वायरल हुए गाली कांड ऑडियो ने पूरे राजनीतिक माहौल में भूचाल ला दिया था। उस ऑडियो में भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद रावण’और उनकी पूर्व प्रेमिका के बीच हुई बातचीत ने सबको चौंका दिया था। इस बातचीत में चंद्रशेखर न केवल मायावती के लिए अभद्र शब्दों का इस्तेमाल करते सुने गए, बल्कि बसपा संस्थापक कांशीराम तक पर आपत्तिजनक टिप्पणी की गई।ऑडियो में यह भी दावा किया गया कि मायावती को उत्तराधिकारी बनाने के लिए कांशीराम पर दबाव डाला गया था। इस ऑडियो के वायरल होते ही राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि मायावती अब कोई बड़ा धमाका कर सकती हैं। लेकिन सबकी उम्मीदों के उलट, मायावती ने न तो कोई भावनात्मक प्रतिक्रिया दी, न ही कोई बयानबाजी। उन्होंने सिर्फ इतना कहा — जिनकी जैसी सोच, वैसी उनकी करनी।लेकिन चुप्पी के पीछे एक सुनामी थी — और वह अब फूट पड़ी है।गाली कांड के कुछ ही दिनों बाद मायावती ने लखनऊ में मुस्लिम भाईचारा कमेटी की एक बड़ी बैठक बुला ली। यह मीटिंग यूं तो औपचारिक लग रही थी, लेकिन इसके पीछे छिपा सियासी संदेश बहुत गहरा था .
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बसपा अब 2027 के चुनाव के लिए दलित-मुस्लिम गठजोड़ के फार्मूले पर फुल एक्शन मोड में उतर चुकी है। बैठक में मायावती ने मुस्लिम नेताओं को खुला संदेश दिया —22 फ़ीसदी दलित और 20 फ़ीसदी मुसलमान अगर साथ आ जाएं, तो बीजेपी की सरकार पल भर में गिर सकती है।मायावती का यह बयान सियासी समीकरणों को झकझोर देने वाला था। उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव ने मुसलमानों को सिर्फ वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया, कभी उन्हें सम्मानजनक जगह नहीं दी। मायावती ने तंज कसते हुए पूछा कि क्या अखिलेश यादव किसी मुस्लिम नेता को प्रदेश अध्यक्ष या राष्ट्रीय पद दे पाए?इसके साथ ही उन्होंने अपने शासनकाल की उपलब्धियों का भी हवाला दिया। बसपा की ओर से एक बुकलेट जारी की गई, जिसमें बसपा राज में मुसलमानों के लिए किए गए 100 बड़े फैसलों का जिक्र था — मदरसा आधुनिकीकरण, अल्पसंख्यक कल्याण योजनाएं, और सांप्रदायिक दंगों पर नियंत्रण जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।मायावती ने अपने नेताओं से कहा कि वे इस बुकलेट को लेकर मुस्लिम मोहल्लों में जाएं और लोगों को बताएं कि बसपा सरकार ही मुसलमानों की सच्ची हितैषी थी।मायावती की इस सधी हुई चाल से सबसे बड़ा झटका चंद्रशेखर आजाद और अखिलेश यादव दोनों को लगा है।चंद्रशेखर जो खुद को दलितों का मसीहा और मुसलमानों का भाई बताते थे, अब उसी मुस्लिम वोट बैंक पर मायावती ने दस्तक दे दी है। ऑडियो कांड ने चंद्रशेखर की छवि को पहले ही कमजोर कर दिया था, अब मायावती की रणनीति ने उनके राजनीतिक आधार को सीधा चुनौती दी है।दूसरी ओर, अखिलेश यादव के लिए यह खतरे की घंटी है। उत्तर प्रदेश में मुसलमान अब तक सपा के नैचुरल वोटर माने जाते रहे हैं, लेकिन अगर मायावती अपने इस मिशन में सफल होती हैं तो सपा का गणित उलट सकता है।साल 2007 का इतिहास खुद इसका गवाह है — जब मुसलमानों और दलितों के एकजुट होने पर बसपा को पूर्ण बहुमत मिला था और मायावती मुख्यमंत्री बनी थीं।यह बात बीजेपी भी भली-भांति समझ रही है कि दलित-मुस्लिम समीकरण अगर एक बार फिर सक्रिय हुआ, तो उसकी सबसे मजबूत चुनावी दीवार दरक सकती है।2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को लगभग 41.3% वोट मिले थे, जबकि मायावती का वोट शेयर 12.9% था। मायावती का सीधा गणित है — अगर 20% मुस्लिम और 22% दलित वोट एकजुट हुए, तो 42% का ब्लॉक तैयार हो जाएगा, जो बीजेपी को सत्ता से बाहर करने के लिए पर्याप्त है।मायावती ने एक ही झटके में यह साबित कर दिया है कि वह अभी भी गेम चेंजर हैं।उन्होंने गाली कांड को मुद्दा बनाने के बजाय उसे अपने लिए अवसर में बदल दिया।जहां अखिलेश यादव और चंद्रशेखर आजाद के समर्थक अभी भी ऑडियो की सियासी सफाई में लगे हैं, वहीं मायावती ने शांत चाल में ऐसा मोहरा चला है जिसने विपक्ष ही नहीं, सत्ताधारी दल के खेमे में भी चिंता बढ़ा दी है।

अब सवाल सिर्फ इतना है कि क्या यह मायावती की “राजनीतिक वापसी” है या “बसपा युग का पुनर्जागरण?उत्तर प्रदेश की सियासत अगले कुछ महीनों में इसका जवाब दे देगी।अब इस पूरी खबर का निष्कर्ष क्या है तो वो भी आप जान लीजिये मायावती की यह चाल न सिर्फ रणनीतिक है, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी।उन्होंने अपने विरोधियों को प्रतिक्रिया के जाल में फंसा दिया है और खुद विकल्प की जगह “केन्द्र” में लौट आई हैं।एक तरफ अखिलेश यादव और चंद्रशेखर आजाद को जनता के बीच सफाई देनी पड़ रही है, दूसरी तरफ मायावती अपने कैडर को पुनर्गठित कर रही हैं।अगर यह योजना जमीन पर उतर गई — तो 2027 का रास्ता वाकई बहुजन पुनर्जागरण की ओर जाता दिख सकता है।







