उत्तर प्रदेश में बिजली व्यवस्था इन दिनों भारी आलोचना का केंद्र बनी हुई है। ग्रामीण हो या शहरी इलाका—हर तरफ बिजली कटौती, ट्रांसफार्मर खराबी, और समय पर मरम्मत न होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। इस बीच, जब ऊर्जा मंत्री एके शर्मा—जो प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री शाह के करीबी माने जाते हैं—ने विभागीय अफसरों को कड़े शब्दों में फटकार लगाई और चेताया कि “आपकी वजह से मुझे गालियां खानी पड़ रही हैं,” तब भी अफसरों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। और यहीं से योगी सरकार की नाराजगी असहनीय स्तर पर पहुंच गई।दरअसल, अफसरशाही का एक तबका लगातार ऊर्जा मंत्री एके शर्मा की बातों को हल्के में ले रहा था। विभागीय बैठकों में दी गई हिदायतों का पालन नहीं हो रहा था, और न ही फील्ड में कोई ठोस सुधार देखने को मिल रहे थे। ऐसे में जब एके शर्मा की चेतावनियों को नजरअंदाज किया गया, तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सीधे फ्रंटफुट पर खेलने का फैसला लिया।सीएम योगी ने बिजली विभाग के सभी प्रमुख अधिकारियों को तत्काल अपने आवास पर तलब किया और बैठक में दो टूक कहा:बिजली सेवा है, व्यापार नहीं। अगर जनता को बिजली नहीं मिली, तो इसकी जिम्मेदारी आप सभी की होगी। किसी भी लापरवाही को अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
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इस बैठक के बाद माहौल पूरी तरह बदल गया। अधिकारियों के चेहरे पर हवाइयां उड़ती देखी गईं। जिन अफसरों ने अब तक एके शर्मा की चेतावनियों को अनदेखा किया था, उन्हें समझ आ गया कि अब मामला सिर्फ विभागीय स्तर पर नहीं, मुख्यमंत्री स्तर पर सख्त नियंत्रण में आ चुका है।सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री ने यह भी साफ कर दिया कि अगर कोई अफसर अब भी अपनी कार्यशैली नहीं सुधारता, तो ट्रांसफर, निलंबन या सीधा बर्खास्ती तक की कार्रवाई हो सकती है।यह भी एक दिलचस्प और अहम पहलू है कि योगी का यह एक्शन सिर्फ जनता को राहत देने की कोशिश नहीं बल्कि पार्टी के अंदर एक शक्ति प्रदर्शन भी माना जा रहा है। जिस तरह मोदी-शाह के करीबी माने जाने वाले एके शर्मा की बातों को अफसरशाही ने हल्के में लिया और योगी ने फिर सख्ती दिखाई—यह कहीं न कहीं पार्टी के उच्च स्तर तक “राज्य नेतृत्व की ताकत” का संकेत भी है।यूपी की राजनीति में लंबे समय से यह चर्चा रही है कि योगी आदित्यनाथ और दिल्ली की भाजपा लीडरशिप (खासतौर से मोदी-शाह) के बीच एक ‘ठंडी प्रतिस्पर्धा’ चल रही है। ऐसे में योगी की यह कार्रवाई उस संदेश की तरह भी देखी जा सकती है कि “राज्य में अंतिम निर्णय और सख्ती मुख्यमंत्री की ही चलेगी, चाहे अफसर किसी का करीबी हो।बिजली संकट कोई सामान्य प्रशासनिक मुद्दा नहीं रहा है। 2027 के विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आते जाएंगे, वैसे-वैसे बिजली जैसी बुनियादी सेवाएं जनता के गुस्से और वोटिंग पैटर्न को सीधे प्रभावित करेंगी।

व्यापारियों से लेकर किसानों तक, हर वर्ग बिजली कटौती से परेशान है। रही-सही कसर भीषण गर्मी ने पूरी कर दी है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष इसी बिजली संकट को हथियार बनाकर योगी सरकार के खिलाफ एक व्यापक जन असंतोष खड़ा करना चाहता है। और यही वजह है कि मुख्यमंत्री खुद मैदान में उतरकर सिस्टम को सुधारने के लिए ‘झटका देने वाली’ कार्रवाइयों का सहारा ले रहे हैं।इस पूरी घटनाक्रम से एक बात और साफ हो गई है—अब अफसरशाही को यह भ्रम नहीं रहना चाहिए कि वह किसी केंद्रीय मंत्री या नेता के भरोसे रहकर लापरवाही कर सकती है। योगी सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शासन व्यवस्था में ढीलापन बर्दाश्त नहीं होगा, चाहे सामने कौन भी हो।बिजली के बहाने योगी ने न सिर्फ प्रशासन को झकझोरा, बल्कि यह भी दिखा दिया कि 2027 की राह में वह किसी भी प्रकार की लापरवाही या अंदरूनी असंतुलन को जगह नहीं देंगे। सवाल यह नहीं कि एके शर्मा की बात किसने सुनी या नहीं, असली बात यह है कि अब योगी ने अफसरों के पसीने छुड़ा दिए हैं।







