
मथुरा-वृंदावन की धरती पर संतों की परंपरा का इतिहास सैकड़ों वर्षों से सुनहरा रहा है। यहाँ ऐसे संत हुए जिन्होंने अपने प्रेम, करुणा और सरल भक्ति के बल पर करोड़ों भक्तों को ईश्वर से जोड़ा। इसी परंपरा में आज प्रेमानंद जी महाराज का नाम लिया जाता है, जिनकी वाणी और सहज भाव ने बच्चों से लेकर बड़ों तक हर किसी के मन को स्पर्श किया है। वे किसी पदवी या उपाधि के मोहताज नहीं, उनकी पहचान भक्तों के दिलों में दर्ज है।लेकिन हाल ही में जगतगुरु रामभद्राचार्य का एक बयान सामने आया जिसने संत समाज और भक्तजनों में खलबली मचा दी। उन्होंने प्रेमानंद महाराज को “विद्वान नहीं, चमत्कारी नहीं, मात्र एक बालक” बताते हुए चुनौती दी कि “यदि उनमें शक्ति है तो संस्कृत का एक अक्षर बोलकर या श्लोक का अर्थ समझाकर दिखाएं।
यह बयान जितना अप्रत्याशित था, उतना ही विवादास्पद भी।सोशल मीडिया पर यह वीडियो वायरल होते ही प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। लोगों ने रामभद्राचार्य के कथन को ज्ञान का अहंकार बताते हुए उनकी आलोचना की, वहीं प्रेमानंद महाराज के भक्तों ने उन्हें “प्रेम और भक्ति का मूर्त रूप” कहकर सराहा। सवाल यह है कि क्या संत का मूल्यांकन केवल शास्त्रीय ज्ञान की कसौटी पर होना चाहिए?रामभद्राचार्य निस्संदेह अद्वितीय विद्वान हैं, संस्कृत के महासागर हैं, लेकिन भारतीय संत परंपरा का इतिहास यह कहता है कि ज्ञान और प्रेम, दोनों अपने-अपने आप में संपूर्ण मार्ग हैं। कबीर ने कहा था— पढ़ि पढ़ि पंडित मूर्ख भया, पढ़ि पढ़ि भया गधेर। ”यह संकेत था कि शास्त्रों का बोझ अगर विनम्रता और करुणा से रहित हो, तो वह मनुष्य को ईश्वर से दूर भी कर सकता है।
प्रेमानंद महाराज का मार्ग भिन्न है। वे अपने प्रवचनों और कथा में शास्त्रार्थ से अधिक प्रेम और भाव पर बल देते हैं। उनका संदेश सरल है: “भगवान को पाने के लिए कठिन ग्रंथों की जरूरत नहीं, एक सच्चे हृदय की जरूरत है।” यही कारण है कि बच्चे-बच्चे तक उनसे प्रभावित हैं।रामभद्राचार्य के बयान से यह आभास होता है कि कहीं न कहीं वे प्रेमानंद महाराज की लोकप्रियता और सहज प्रवाह से असहज हुए। लेकिन यह याद रखना होगा कि संत परंपरा में दूसरों को नीचा दिखाने की परंपरा कभी नहीं रही।
तुलसीदास ने भी लिखा—पर हित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई। ”अर्थात दूसरों को ऊपर उठाना ही धर्म है, न कि उन्हें गिराना।भक्त समाज यह समझता है कि हर संत का मार्ग अलग है। रामभद्राचार्य यदि गहन शास्त्रार्थ से भक्तों को ईश्वर से जोड़ते हैं तो यह उनकी साधना है, पर प्रेमानंद महाराज यदि प्रेम की धारा से जन-जन को कृष्ण के चरणों तक ले जाते हैं तो वह भी उतना ही पवित्र मार्ग है। अब इस पूरी खबर का निष्कर्ष क्या है तो वो भी आप जान लीजिये यह है कि संत समाज में यह द्वंद्व अनावश्यक है। जनता ज्ञान की बहस से कम और प्रेम की अनुभूति से अधिक जुड़ती है। यदि जगतगुरु वास्तव में जगतगुरु हैं, तो उन्हें सहिष्णुता और उदारता दिखानी चाहिए। संत का सबसे बड़ा आभूषण ज्ञान नहीं, विनम्रता है। यही संत परंपरा का असली सौंदर्य है, और यही आज की सबसे बड़ी जरूरत भी।






