नब्बे के दशक में बिहार की पहचान डर और अपराध से जुड़ गई थी। रात होते ही सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था और हर मोड़ पर लोगों के मन में खौफ रहता था। लूट, अपहरण, रंगदारी और हत्या आम बात हो गई थी। इसी दौर में एक नाम तेजी से उभरा — मोहम्मद शहाबुद्दीन।
कहा जाता था कि सिवान में पत्ता भी उसकी मर्जी से हिलता था। नेता, अधिकारी और पुलिस तक उसका नाम सुनकर घबरा जाते थे। वह तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का करीबी माना जाता था और सिवान का सबसे ताकतवर नेता बन चुका था।
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अपराध से राजनीति तक का सफर
मोहम्मद शहाबुद्दीन का जन्म 10 मई 1967 को प्रतापपुर में हुआ था। कॉलेज के दिनों से ही वह अपराध की दुनिया में उतर गया था। 19 साल की उम्र में उसके खिलाफ पहला केस दर्ज हुआ और धीरे-धीरे उसका नाम पूरे इलाके में फैलने लगा।
1985 में वह निर्दलीय विधायक बना। इसके बाद उसे राजनीतिक संरक्षण मिलने लगा। 1991 में लालू यादव के साथ जुड़ाव के बाद उसकी ताकत और बढ़ गई। सिवान में जमीन विवाद, झगड़े और घरेलू मामलों के फैसले तक उसके यहां होने लगे।
सांसद बनने के बाद बढ़ा खौफ
1996 में वह सांसद बना और 1999 में फिर से जीत हासिल की। उसकी ताकत हर चुनाव के साथ बढ़ती चली गई। लेकिन कुछ घटनाओं ने पूरे देश को हिला कर रख दिया —
- छोटे शुक्ला का अपहरण और हत्या
- तेजाब डालकर दो भाइयों की हत्या
- गवाह की हत्या
- उसके घर से AK-47 और नाइट विजन डिवाइस बरामद होना
अब उसका डर सिर्फ सिवान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे देश में उसका नाम फैल चुका था।
जेल से चुनाव और फिर पतन
2004 में वह जेल में रहते हुए चुनाव जीता। अस्पताल का एक पूरा वार्ड उसके “ऑफिस” के रूप में इस्तेमाल होता था। उस चुनाव में बड़े पैमाने पर बूथ लूट के आरोप लगे।
2009 में चुनाव लड़ने पर रोक लगी, तो उसकी पत्नी हिना शहाब को मैदान में उतारा गया, लेकिन वह हार गईं। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने शहाबुद्दीन को उम्रकैद की सजा सुनाई।
अंत
तिहाड़ जेल में बंद रहते हुए वह कोविड से संक्रमित हुआ और 2021 में उसकी मौत हो गई।
कुछ लोगों के लिए वह मसीहा था, लेकिन कानून की नजर में वह ऐसा नाम था जिसने बिहार को डर के साथ जीना सिखाया।







