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श्रीप्रकाश शुक्ल : ‘वर्चस्व’ की राजनीति का वह नाम, जिसने पूर्वांचल को खामोशी में जीना सिखाया

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पूर्वांचल की राजनीति में कुछ नाम ऐसे रहे हैं, जिनका असर सत्ता से नहीं बल्कि खौफ से चलता था। ऐसे ही नामों में एक किस्सा आज भी फुसफुसाहट में सुनाया जाता है कहा जाता है कि एक फोन कॉल के बाद राजा भैया लंबे वक्त तक सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिए थे। वजह कोई राजनीतिक विवाद नहीं था, कोई चुनावी हार नहीं थी, बल्कि एक नाम था श्रीप्रकाश शुक्ल। उस दौर में यह घटना सिर्फ एक धमकी नहीं मानी गई, बल्कि पूर्वांचल की राजनीति का अघोषित संविधान बन गई थी,पूर्वांचल में श्रीप्रकाश शुक्ल को किसी नेता की तरह नहीं देखा जाता था। कहा जाता है कि वह राजनीति नहीं करता था, वह वर्चस्व स्थापित करता था।

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पुलिस रिपोर्टों के मुताबिक, श्रीप्रकाश शुक्ल बातचीत के दौरान एक ही शब्द बार-बार दोहराता था “यह वर्चस्व की लड़ाई है।” बताया जाता है कि वह 10–20 बार तक यही बात कहता था, ताकि सामने वाला यह समझ जाए कि यह कोई बहस नहीं है, बल्कि एक चेतावनी है। उस दौर में उसकी मौजूदगी ही माहौल बदल देने के लिए काफी मानी जाती थी।उस समय पूर्वांचल में बाहुबल की पहचान रहे नाम बृजेश सिंह, मुख्तार अंसारी और राजा भैया राजनीतिक गलियारों में बेहद प्रभावशाली माने जाते थे। लेकिन क्षेत्र में यह बात आम थी कि श्रीप्रकाश शुक्ल के समने बड़े-बड़े बाहुबली भी सतर्क रहते थे। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, एक बार श्रीप्रकाश शुक्ल ने राजा भैया को फोन पर धमकी दी थी। कहा जाता है कि उस धमकी के बाद राजा भैया काफी समय तक सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आए, जब तक कि श्रीप्रकाश शुक्ल का अंत नहीं हो गया। इस घटना ने पूरे पूर्वांचल में यह संदेश दे दिया था कि ताकत किसके हाथ में है।आज भले ही श्रीप्रकाश शुक्ल का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका हो, लेकिन उसकी परछाइयाँ आज भी पूर्वांचल की राजनीति में चुपचाप घूमती हैं। पूर्वांचल की राजनीति का यह अध्याय यही सिखाता है कि जब ताकत बंदूक और धमकी से तय होने लगे, तो चुनाव सिर्फ रस्म बन जाते हैं। और तब इतिहास में नेता नहीं, नाम नहीं सिर्फ खौफ दर्ज होता है।

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