सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सात वर्ष से कम कारावास की सजा वाले अपराधों के मामलों में आरोपी को गिरफ्तार करने के बजाय धारा 35(3) का नोटिस दिया जाना चाहिए। पीठ ने पुलिस को कहा है कि गिरफ्तारी से पहले खुद से पूछें कि क्या यह जरूरी है?
सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है। यह देखते हुए कि किसी पुलिस अधिकारी के लिए ऐसा करना वैध है, मात्र इसलिए गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। जांच एजेंसी को किसी आरोपी को पूछताछ के लिए हिरासत में नहीं लेना चाहिए और ऐसा तभी किया जाना चाहिए जब जांच के लिए यह जरूरी हो। सुप्रीम कोर्ट ने इसी के साथ गिरफ्तारी से जुड़ी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता ( BNSS ), 2023 की कई धाराओं की व्याख्या कर दी है। आइए पूरा मामला समझते हैं।
7 साल तक की सजा वाले मामलों में अब नोटिस होगा ज़रूरी-
लाईव लॉ की एक रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एनके सिंह की बेंच ने एक मामले की सुनवाई के दौरान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता(BNSS), 2023 की विभिन्न धाराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सात वर्ष तक के कारावास से जुड़े दंडनीय अपराधों के संबंध में किसी आरोपी या संबंधित व्यक्ति को कानून की धारा 35(3) के तहत नोटिस जारी करना नियम है।
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गिरफ्तारी के अधिकारों की सीमा सुप्रीम कोर्ट ने की स्पष्ट-
बेंच ने कहा-BNSS, 2023 की धारा 35(6) को धारा 35(1)(ख) के साथ मिलाकर दी गई गिरफ्तारी की शक्ति को पुलिस अधिकारी की व्यक्तिपरक सुविधा के बजाय एक सख्त वस्तुनिष्ठ आवश्यकता के रूप में समझा जाना चाहिए। इसका यह अर्थ नहीं है कि पुलिस अधिकारी केवल पूछताछ के लिए गिरफ्तार कर सकते हैं। बल्कि, इसका अर्थ यह है कि पुलिस अधिकारी को यह सुनिश्चित करना होगा कि 7 वर्ष तक के कारावास से दंडनीय अपराध के संबंध में जांच संबंधित व्यक्ति को हिरासत में लिए बिना प्रभावी ढंग से आगे नहीं बढ़ सकती है। इसके विपरीत कोई भी व्याख्या BNSS की धारा 35(1)(ख) और धारा 35(3) से 35(6) के उद्देश्य और विधायी आशय को स्पष्ट रूप से विफल कर देगी।
गिरफ्तारी के लिए लिखित में कारण होना अनिवार्य-
सुप्रीम कोर्ट के एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि धारा 35(3) के तहत नोटिस जारी करना अनिवार्य है और केवल गिरफ्तारी के कारणों को दर्ज करके इसे टाला नहीं जा सकता है। बेंच ने कहा-यह कहना पर्याप्त है कि गिरफ्तारी के बिना भी जांच जारी रह सकती है। गिरफ्तारी की वजहों को लिखित में होना चाहिए।
संज्ञेय अपराध के घटित होने के संबंध में अपनी राय बनाने के उद्देश्य से साक्ष्य जुटाते समय, एक पुलिस अधिकारी को स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि क्या गिरफ्तारी आवश्यक है? यह सुरक्षा उपाय इसलिए प्रदान किया गया है क्योंकि किसी भी स्थिति में, किसी आरोपी व्यक्ति को गिरफ्तार करने की शक्ति हमेशा एक पुलिस अधिकारी के पास उपलब्ध होती है। भले ही उसने पहले के पद में ऐसा न करने के अपने लिखित कारण दर्ज कर लिए हों।
बिना ज़रूरत गिरफ्तारी नहीं: अफसरों से आत्मपरीक्षण की अपेक्षा-
बेंच ने यह भी कहा कि- हमारे द्वारा दी गई व्याख्या के आधार पर हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि पुलिस अधिकारी की ओर से गिरफ्तारी केवल एक वैधानिक विवेकाधिकार है जो उसे साक्ष्य एकत्र करने के रूप में उचित जांच करने में सुविधा प्रदान करता है। इसलिए इसे अनिवार्य नहीं माना जाएगा।
नतीजे के अनुसार, पुलिस अधिकारी को उक्त कार्रवाई करने से पहले खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या गिरफ्तारी आवश्यक है या फिर नहीं?
भले ही BNSS, 2023 की धारा 35 (1) (ख) के तहत उल्लिखित शर्तों के अनुसार किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी को उचित ठहराने वाली परिस्थितियां उपलब्ध हों, गिरफ्तारी तब तक नहीं की जाएगी जब तक कि यह बिल्कुल आवश्यक न हो।







